वो ट्यूशन वाला लड़का!

वो ट्यूशन वाला लड़का!

मैं इंटर के फाइनल ईयर में थी. रही बात मेरे स्वभाव की बात तो मैं यह तो नहीं कहूंगी कि बहुत सीधी हूं. वैसे इसका मतलब यह भी नहीं कि बिलकुल तूफान मेल हूं. हां, चंचलता के साथ संजीदगी की मॉकटेल मुझे जरूर कह सकते हैं.

मेरे स्वभाव के कारण मेरी मां जब-तब नसीहत भी देती रहतीं, कहतीं, “अब तू बच्ची नहीं रही, सयानी हो गयी है. तेरी चाल-ढाल, हाव-भाव और तेरे बोलने के भी अब अलग मायने होते हैं. लिहाजा, अब अल्हड़पन छोड़, बड़ों की तरह सलीके से रहना सीख. नहीं तो लोग जाने क्या-क्या कहेंगे?” मैं चुपचाप उनकी बात सुन लेती – और फिर आगे बढ़ जाती.

मां कभी-कभी तो खीझ कर बोलतीं, “तू तो मेरी बात एक कान से सुनती है दूसरे से निकाल देती है.”

मैं कोई जवाब देती इससे पहले पापा ही बोल देते, “नहीं-नहीं मेरी बेटी ऐसी नहीं है कि तुम्हारी बात सुनकर अनसुनी करे.”

पापा की बात पर मां का चेहरा सही में लाल हो जाता. वो मुहावरे में लिखने वाली बात नहीं.

“अरे भई, जब ये तुम्हारी बात सुनती ही नहीं तो दूसरे कान से निकालने का सवाल ही कहां उठता है. क्यों बेटा?”

“पापा आप भी ना,” मैं बस इतना ही कह पाती. इसके बाद पापा और मैं खिलखिला कर हंस पड़ते.

ब्लू मेरी मां का फेवरेट कलर था. वो अक्सर नीली साड़ी पहनतीं. नीली साड़ी में मां का सोने जैसा रंग और गुस्से में लाल चेहरा – यह सब खूब फबता.

जब मैं मां को इस अंदाज में देखती तो बोलती, “पापा, रेनबो!” मां को चिढ़ाने, उनका दिमाग डायवर्ट करने और उन्हें मनाने के लिए हम दोनों ने ये तरीका खोज निकाला था. “पापा, रेनबो!” ये सुनकर मां मुस्कुरातीं. मेरी बात पर गुस्सा भी होतीं लेकिन यही बात जब पापा बोलते तो वो शर्माती हुई बोलतीं, “अब रहने भी दीजिए,” और अपने काम में लग जातीं.

स्कूल की पढ़ाई से कोर्स पूरा तो हो नहीं पाता, इसलिए रेगुलर पढ़ाई के साथ-साथ मैं मैथ्स के लिए ट्यूशन भी लेती.

हमारा बैच न तो बहुत बड़ा था न ही बहुत छोटा. हम सात-आठ लोग होते थे – संख्या निश्चित इसलिए नहीं रहती क्योंकि कभी कोई बीच में छोड़ कर चला जाता – और कभी कोई नया आया तो उसे भी इंसर्ट कर लिया जाता. हम तीन-चार लड़कियां होतीं – और बाकी लड़के. मेरा शरारती मन कहां बाज आने वाला सो आदतन वहां भी हर वक्त मुझे शरारत ही सूझती.

एक बड़ी सी टेबल थी. हमारे ट्यूटर बीच में बैठते. बायीं तरफ लड़कियां बैठतीं और दायीं ओर लड़के, लेकिन मैं दायीं ओर ही बैठती. मेरे सामने मेरी कोई न कोई दोस्त बैठती. इस तरह टेबल का ज्यादातर हिस्सा लड़कियां ही घेर लेतीं. जो जगह बचती उसमें लड़के जैसे तैसे बैठते. जब मैं बेंच पर बैठती तो जहां तक जाता टेबल के नीचे अपने दोनों पांव फैला देती. इस तरह हमेशा अपना पैरे किसी लड़की के पैर पर रख देती.

एक दिन मैं थोड़ी देर से पहुंची. संयोग से उस दिन मेरी कोई भी दोस्त नहीं आयी थी. मैं एक किनारे बैठ गयी. जैसी कि मेरी आदत थी, मैंने पांव फैलाये और सामने वाले के पैर पर अपने पैर रख दिये. अगले ही पल मुझे कुछ फर्क महसूस हुआ. सामने देखा तो वह लड़का था. अब मैं सॉरी भी क्या बोलती. उसकी ओर देखा, मुस्कुराई और धीरे से पैर हटा लिया. जब तक वहां रही बड़ी मुश्किल से मैं अपने को रोक पाई. ट्यूशन खत्म होने पर मैं घर आ गयी.

अगले दिन जब मैं ट्यूशन सेंटर पहुंची तो देखा वही लड़का पहले से मेरी सामने वाली सीट पर बैठा था. जब मेरी दोस्त आयी तो वह उसकी बगल में जाकर बैठ गयी. मैंने भी सोचा कि लड़का बैठा है तो बैठे, मैं तो अपने ही तरीके से बैठूंगी.

पढ़ाई के दौरान कब मेरे पैर हरकत में आये और लड़के के पैर पर फैल गये मुझे ध्यान ही न रहा. लड़के ने भी कुछ नहीं कहा. बस मुस्कुरा भर दिया.

आगे से रोज वह लड़का उसी जगह बैठने लगा. दूसरे की वजह से अपनी सीट बदलना मेरे उसूलों के खिलाफ था. मैं भी वहीं बैठती और बीच में मेरे पैर वैसे ही आगे तक बढ़ जाते. यह एक रूटीन जैसा हो गया. इसी तरह हफ्ता भर बीत गया.

संडे को छुट्टी होती. एक बार मंडे को मैं किसी वजह से ट्यूशन नहीं गयी. ट्यूजडे को जब मैं पहुंची तो वो लड़का नहीं था. मैं पूरे टाइम फ्री होकर रही.

अगले दिन जब मैं पहुंची तो मेरे से पहले सिर्फ वही आकर बैठा था. बाकी आने वाले थे इसलिए ट्यूटर भी उठकर चले गये – यह बोल कर कि सब आ जाएं तो पढ़ाएंगे.

“आप कल आयी थीं? ” उस लड़के ने पूछा.

मैंने हां कहा तो उसने पूछा, “आप अपना नोट्स देंगी?”

मैंने कहा, “ठीक है, दे दूंगी. इसमें क्या है?” मैंने नोट्स दे दिये.

अगले दिन फिर वो लड़का नहीं आया. मुझे नोट्स चाहिये थे, लेकिन मैं कर भी क्या सकती थी. न तो उसके बारे में कुछ जानती थी और न ही मुझे उसकी जरूरत समझ में आती.

वो लगातार दो दिन नहीं आया. बहरहाल, जब हमारी भेंट हुई तो उसने सबसे पहले मेरे नोट्स दे दिये.

“सॉरी.”’

“इट्स ओके.”

मेरे कुछ डाउट्स थे. ट्यूटर ने सॉल्व कर दिये. जब हम लोग चलने को हुए तो वो लड़का मेरी ओर देखते हुए बोला, “एक मिनट!”
“बोलो,” मैंने यूं ही कहा और उसकी ओर घूम गई. मेरी बाकी दोस्त अलग हटकर खड़ी हो गयीं. मुझे नहीं समझ आया ऐसा उन्होंने क्यों किया लेकिन मैं कुछ बोली नहीं.

“आप मुझे अपना फोन नंबर दे सकती हैं? अगर कभी नहीं आऊं तो पढ़ाई के बारे में पूछ लूंगा.” मैंने उसे अपना नंबर दे दिया.

“उसने तेरा नंबर मांगा ना,” जब अपने दोस्तों के पास पहुंची तो उन्होंने पूछा और सब की सब हंस पड़ीं. मुझे न तो इसमें कोई खास बात समझ में आई और न ही हंसने वाली. मगर मैंने कुछ कहा नहीं.

घर पहुंची तो पापा ने बताया कि किसी लड़के का फोन था. समझ में नहीं आया ऐसा कौन लड़का मुझे फोन करेगा जिसके बारे में पापा न जानते हों. तभी फिर घंटी बजी.

“हैलो,द्विजा!” फिर उसने अपना नाम बताया. मैंने उससे पूछा, “फोन क्यों किया? ट्यूशन तो आए थे.” उधर से कोई आवाज नहीं आई. मुझे लगा फोन कट गया होगा. मैंने रख दिया. सोचा मिलेगा तो पूछूंगी. दरअसल, मां ने किसी को भी अपना फोन नंबर देने से मना किया था. वो तो मेरी सहेलियों को भी नंबर देने से मना करतीं लेकिन कुछ को मैंने दे रखे थे.

ट्यूशन से अगले दिन फिर वो नदारद रहा. शाम को स्कूल से लौटी तो घंटी बज रही थी. फोन मैंने ही उठाया. फोन पर वही लड़का था. उसने ट्यूशन के बारे में पूछा. मैंने टॉपिक बताये और फोन रख दिया.

बाद में मैंने गौर किया कि वो हर दूसरे दिन ट्यूशन से गायब रहता. अगर आता भी तो काफी लेट. कभी-कभी तो तब जब क्लास खत्म होने को रहती. फिर फोन पर टॉपिक, डाउट्स और ऐसी ही बातें पूछा करता. पहले कौन-कौन आया था और कौन नहीं – ये सब पूछता. बाद में वह मेरे घरवालों और रिश्तेदारों के बारे में पूछा करता.

ट्यूशन शुरू किये करीब डेढ़ महीने बीते होंगे. अब गाहे-बगाहे मेरी सहेलियां भी मुझे चिढ़ातीं, “क्यों, उसका फोन आता है ना?”

“हर बात का तुम लोग गलत ही मतलब निकालती हो?” मैं उन्हें जोर से डपट देती.

मैं दोस्तों को डपट कर चुप तो करा देती लेकिन मुझे भी लगने लगा मैंने उसे नंबर देकर ठीक नहीं किया. खैर, दे दिया तो दिया. जो होगा देखा जाएगा. सोच कर मैं आगे बढ़ जाती.

एक दिन ट्यूशन के रास्ते में वो सामने से आता दिखा. मेरे पास पहुंच कर उसने अपनी साइकिल रोक दी. मैं भी सीट से उतर कर खड़ी हो गई.
उसने हालचाल पूछा और मेरे ग्रुप की एक लड़की का नाम लेकर उसके बारे में पूछा. उसके हाथ में एक लिफाफा था. उसने लिफापा आगे बढ़ाते हुए पूछा “क्या आप ये लिफाफा रिया को दे देंगी?”

मुझे उसकी हरकत कुछ ठीक नहीं लगी. मैंने कहा, “आप खुद क्यों नहीं दे देते?”

“असल में, आज मुझे ट्यूशन नहीं जाना. मुझे कहीं और जाना जरूरी है.” उसने कहा.

“तो इसमें क्या है? कल दे दीजियेगा,” मैंने कहा.

“नहीं-नहीं ये उसे आज ही देना बहुत जरूरी है. प्लीज, आप उसे दे दीजिएगा.”

बीच सड़क पर उसकी ये हरकत मुझे अच्छी नहीं लगी. फिर भी मैंने खुद को कूल रखा. शायद मैं अपने औकात पर आ जाती तो…
पहले तो मुझे समझ में नहीं आया कि क्या करूं. फिर मैंने उसे उसी के अंदाज में समझाने की कोशिश की.

“इतना ही जरूरी है तो आप उसके घर जाकर क्यों नहीं दे देते?”

“दरअसल, मुझे मम्मी की दवा लेने जाना है और उसके बाद स्कूल जाना होगा.”

फिर मैं सख्ती से पेश आई. “मैंने बोला ना. आप खुद जाइए और दीजिए.” इतना बोलने के बाद मैं साइकिल पर सवार हुई और आगे बढ़ गई.
मैंने ट्यूशन अटेंड किया और घर लौट आई. संयोग से रिया भी ट्यूशन नहीं आई थी. जब स्कूल में मिली तो मैंने उसे लिफाफे के बारे में बताया.

“भई वाह, मानना पड़ेगा. नोट्स वो तेरा लेता है. फोन तुझे करता है – और लिफाफा मुझे देना चाहता है,” रिया ने मेरा मजाक उड़ाते हुए बोला, “मूर्ख बनाने के लिए तुझे मैं ही मिलती हूं. ऐसे तो अपने आगे तू किसी को लगाती नहीं.”

“अरे स्टुपिड, वो लिफाफा तेरे लिए होगा. उसमें लेटर होगा. तेरा फर्स्ट लव लेटर.” दूसरी दोस्त ने समझाने की कोशिश की.

रिया अपनी आदत के मुताबिक ठहाके लगा रही थी. “तूने लिफाफा लिया क्यों नहीं. भले उसे वापस नहीं देते. हम सब मिल कर पढ़ते तो भला, भले-मानुष ने क्या क्या लिखा होगा. नोट्स पढ़ने और उसे समझने के बाद.”

“ये लड़की किसी दिन बेइज्जत न करा दे?” मां के रेनबो मूमेंट की ये बात अचानक मेरे एक कान में गूंजी. दूसरे कान से पापा की बातें सुनाई दी, “हमारी बेटी शरारती जरूर है लेकिन यह हमारा सिर नहीं झुकने देगी. ये ऐसा कोई काम नहीं कर सकती.” एक पल के लिए मैं डर भी गयी, लेकिन अगले ही क्षण खुद को संभाल भी लिया.

पापा को मुझ पर बहुत भरोसा रहा. यह सच भी था. मैं चाहे जैसी हरकत करती हूं मगर हमेशा इस बात का ख्याल रहता कि मेरी वजह से उन्हें भी शर्मिन्दा न होना पड़े.

बीच-बीच में दोस्तों की बातें भी मेरे दिमाग में आयीं. मैंने खुद से सवाल किया – क्या वो लिफाफा मुझे ले लेना चाहिए था? वैसे अपने स्वभाव के हिसाब से मैं वो लिफाफा ले लेती. लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया. लिफाफा न लेने का फैसला मेरा नहीं था. मैं तो शायद एक किरदार थी.

हर बार फैसला शायद इंसान नहीं लेता. कई फैसलों में वो महज एक किरदार होता है. यह बात अलग है कि उस फैसले का नफा-नुकसान उसी के खाते में दर्ज होता है.

मैं सोचने लगी कि अगर मेरे मां-पापा को पता चला तो मैं क्या जवाब दूंगी? यह तो बिलुकल उनका भरोसा तोड़ने वाली बात थी. पहली बार मुझे लगा कि मेरा सहज होना खुद मेरे और मेरे परिवार के लिए कितना कठिन हो सकता है.
अगर दुनिया बनावटी है तो एक बनावटी चोला भी ओढ़ना होगा.

फिर मुझे याद आया. लिफाफे पर एक गुलाब का फूल भी लगा था. तब शायद मैंने उस पर भी गौर नहीं किया था. जब दूसरी बार उसने नोट्स मांगे तो भी मेरी दोस्तों ने मेरी ओर अजीब तरीके से देखा था.

मैंने गौर नहीं किया. जब उसने मेरा फोन नंबर मांगा तो भी मुझे कुछ गलत नहीं लगा. यहां तक कि जब उसका फोन आता तब भी मुझे ऐसा कुछ नहीं लगता. मुझे ये सब यूं लगता. मुझे लड़की और लड़के में कोई फर्क ही नहीं लगता. मोहल्ले में लड़कियों से ज्यादा तो लड़के ही मेरे दोस्त थे. मुझे कभी किसी फर्क का अहसास ही नहीं हुआ.

उस दिन शनिवार था. स्कूल से लौट कर मैं चाय पी रही थी कि घंटी बजी. उसी का फोन था.
“हैलो…”

“हेलो, हां. अब मुझे फोन मत करना.” मेरा लहजा काफी सख्त था. वो कुछ बोला नहीं. फिर मैंने उसे समझाया. मुझे लगा गुस्से में कोई बात खत्म होती नहीं. अगर खत्म भी होती है तो अच्छा अंत नहीं होता.

“इन फैक्ट, जो मुझे पढ़ना था वो मैंने पढ़ लिया है. अब मैं ट्यूशन के लिए नहीं आ रही. फिर फोन पर क्या बताऊंगी. ठीक है?” मैंने उसके रिस्पॉन्स का इंतजार किये बगैर ही फोन रख दिया.

घर में भी मैंने बता दिया कि कोर्स पूरा हो गया. “डेढ़ महीने में ही कोर्स पूरा हो गया? बड़ा ही तेज ट्यूटर है.”

मां ने कहा. मां की बातें सिर्फ उतनी ही नहीं होतीं जो शब्दों से पता चल सके. उन्हें शब्दों से आगे भी समझना होता है. पापा जितना तो नहीं लेकिन थोड़ा बहुत मैं भी धीरे- धीरे समझने लगी थी. शायद मैं बड़ी हो रही थी.

[ END ]


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सत्या एस. दूबे | Satya S. Dubey
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[ABOUT THE AUTHOR: Satya S. Dubey loves storytelling, apart from cooking, shopping and travelling incessantly. She spares most of her time in conceptualizing different form of fiction including children and inspirational stories. A short film ‘SOUR’, based on her story was released recently. She lives in NCR with her spouse and a pet among other people who let her feel very special.]

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