मुझे तो बस मां चाहिए, मेरे लिए – और बच्चों के लिए भी…

मुझे तो बस मां चाहिए, मेरे लिए – और बच्चों के लिए भी…

मेरी मां को काम से फुरसत कम ही मिलती थी कि वो कहानी सुनाएं. वैसे भी उन्हें दादी वाली कहानियां कम ही पता थीं.

दादी के कहानियों का कोटा तो बहुत पहले ही खत्म हो चुका था. इसलिए मैं मां से कहानी सुनाने की जिद करता.

एक दिन जब उनका भी कोटा समाप्त हो गया तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिये. फिर? हम दोनों के सामने एक ही सवाल था.

हर सवाल का सॉल्यूशन तो मां के ही पास होता है. मां बोलीं, “कोई बात नहीं मैं अपने गांव का एक किस्सा सुनाती हूं. जैसे तुम्हारे लिए गर्मागर्म रोटी पकाती हूं, वैसे ही ये कहानी भी बिलकुल ताजा है.” शायद इस दौर की बात होती तो इस कहानी को भी ‘एक्सक्लुसिव’ का टैग मिल जाता. भला कहानियां एक्सक्लुसिव कैसे हो सकती हैं, क्लेम करने की बात और है. और बहती गंगा में हर कोई क्लेम कर लेता है. बहरहाल, मां कहानी सुनाने लगीं.
Happy Mother’s Day Mom!

मेरे गांव में एक कुम्हार था – बंसरोपन. उसका एक बेटा था. बेटे को मिट्टी से कोई लगाव नहीं था. कहीं कपड़े गंदे न हो जाएं – इसलिए हमेशा दूर भागता रहता था.

शादी के बहुत साल गुजर गये फिर भी बंसरोपन कुम्हार को कोई औलाद नहीं हुई. बंसरोपन की पत्नी तेतरी दिन रात पूजा पाठ करती रहती. जो कोई भी बता देता उसी बाबा और तांत्रिक के पास पहुंच जाती.

काला मुर्गा और शराब से लेकर रुपया पैसा और चांदी के बर्तन से लेकर सोने की अंगूठी तक जो मांगता चढ़ावे में दे देती. पूरे सावन शिवाला में चंदन से राम-राम लिख कर बेल पत्र चढ़ाती तो पूरा कातिक गंगा स्नान. घाट तो कई थे लेकिन पचरुखिया ढाला से उतर कर गंगा किनारे तक जाना उसे अच्छा लगता था. हालांकि, इसके लिए उसे एक तरफ से पैदल दस किलोमीटर चलना पड़ता था.

“एगो मरल भी जामि जाइत त मानि लेतीं कि कोखि सून ना रहल,” बरहंपुर में भूईंपरी करते वक्त गांव की महिलाओं से उसने यही कहा था. बांझ का ठप्पा और रिश्तेदारों के ताने सुन सुन कर उसका कलेजा तार तार हो चुका था.

“हंसले घर बसेला, घाबाड़ा जिन,” साथ की महिलाएं हमेशा उसे दिलासा दिलातीं. इतना सुन कर भी उसे बहुत राहत मिलती. जब से शादी हुई तभी से हर महीने हर देवता पित्तर से यही प्रार्थना करती कि मासिक न आए. हर बार उसे लगता कि इस बार तो गर्भ ठहर ही जाएगा – लेकिन साल दर साल बीतते गये और ये बात असंभव सी लगने लगी.

बंसरोपन समझाते कि वे कितने खुशकिस्मत हैं कि कुम्हार कुल में पैदा हुए. एक ऐसे बिजनेस फेमिली में जो कभी इमानदारी से मुंह मोड़ ही नहीं सकते. पूरी दुनिया भले ही मिलावट का धंधा करे.

कुम्हार से भला खुशकिस्मत कौन होगा जिसका धंधा ही इमानदारी की मिसाल है. कहा जा सकता है कि ये मजबूरी की इमानदारी है. अब भला मिट्टी में कोई क्या मिलावट करेगा.

बंसरोपन तरह तरह से तेतरी को समझाते कि देखो हमारी पीढ़ियों में कभी किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं. हर किसी के सुख दुख में हमारी स्वाभाविक हिस्सेदारी होती है. घर में जब बच्चा पैदा होता है तो कलश लेकर हम ही जाते हैं.

कोई गम की बात हुई तो भी घंटा लेकर सबसे पहले हमीं पहुंचते हैं. ऐसे में कुम्हार का तो जीवन ही कल्याण के लिए बना है. जब हमने किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं तो ऊपरवाला हमारा कुछ कैसे बिगाड़ सकता है?

अरे मिट्टी का ये शरीर एक दिन ऐसे ही मिट्टी में मिल जाना है – और हमारी तो गारंटी है. हम तो पैदा भी आंवें के आस पास होते हैं – और क्या पता कभी मिट्टी तैयार करते ही सांस छूट जाए. इतना कहते ही बंसरोपन का मुहं तेतरी हाथ से बंद कर देतीं.

बंसरोपन देखने में अच्छे नहीं थे इसलिए शादी में भी खासी देर हुई थी.

पंडित जी बोले कि गनना तो पट ही नहीं रहा. फिर घर वालों ने पूछा कि उपाय क्या है? उधर तेतरी के साथ भी कुछ ऐसा था. तब लड़की देखने का कोई जरूरी रिवाज तो नहीं था, लेकिन किसी न किसी वजह से शादी रुक जा रही थी.

फिर पंडित जी ने समझाया. कुंडली से गुण-मिलान की जरूरत तब पड़ती है जब बहुत सारे ऑप्शन होते हैं. जब शादी होना ही मुश्किल हो रहा हो तो धर्म कहता है कि विवेक से काम लो. बिना गुण मिलान के ही शादी करो. पंडित जी की ही बात मानी जानी थी, मान ली गई.

शादी के बाद बंसरोपन और तेतरी खुशी खुशी रहने लगे. लोगों को ताज्जुब होता कि बिना गुण मिलाए दोनों इतने प्रेम से कैसे रहते हैं. दोनों में से किसी को जोर से भी बोलते किसी ने कभी नहीं सुना. दोनों के स्वभाव ऐसे मिलते थे जैसे पति-पत्नी नहीं दोनों भाई बहन हों.

वैसे भी आम धारणा तो यही होती है कि शादी की पच्चीसवीं सालगिरह के बाद हर दंपति भाई बहन जैसे हो जाते हैं. अगर ये नियम है तो निश्चित रूप से इसका भी अपवाद होगा – और निश्चिच रूप से है. कोई भी अगल बगल नजर घुमा कर देख सकता है.

हमेशा की तरह तेतरी ने कोई व्रत रखा था – और गंगा स्नान के लिए गई थीं. तेतरी को क्या पता कि जब घाट से घर लौटेगी तो बंसरोपन को घाट भेजने की तैयारी हो रही होगी. दूर से ही उसने देखा कि घर के बाहर गांववाले जुटे हैं. अनहोनी सोच कर वो वहीं गिर पड़ी और बेहोश हो गई. भूखे-प्यासे दस किलोमीटर जाना और आना. बेहोश तो होना ही था.

बंसरोपन भी गांव के बाहर मिट्टी लेने गये थे तेज धूप में गश खाकर गिर पड़े. जब तक लोग देख कर दौड़ते तब तक दुनिया छोड़ चुके थे.

लोगों ने तेतरी को उठाया. मुहं पर पानी छिड़का. जब होश आया तो तेतरी ने देखा उनकी तो दुनिया ही उजड़ चुकी थी. अभी रस्मो-रिवाज के दौर चल ही रहे थे कि तेतरी ने अंदर ही अंदर कुछ अलग सा महसूस किया. महीना पूरा हो चुका था लेकिन मासिक नहीं आया.

तो क्या ये तेतरी के मां बनने का संकेत था? तेतरी काफी देर तक उधेड़बुन में पड़ी रहीं. ऊपरवाले पर गुस्सा भी आ रहा था. जब मांग उजाड़ कर ही कोख बख्शना था, इससे तो अच्छा बांझ ही रखता. तेतरी नौ महीने तक ऐसे ही सवालों से जूझती रही.

अब पूजा पाठ में उसका मन बिलकुल नहीं लगता. हर वक्त उन्हें बंसरोपन की कमी खलती. फिर भी जिंदगी है तो आगे तो बढ़ना ही पड़ेगा.

तेतरी ने सारे व्रत पूजा और नियम छोड़ दिये – और काम में जुट गई. वैसे भी गुजर बसर के लिए और कोई उपाय भी नहीं था. बेटा पैदा हुआ तो नाम रखा – लोरपोछन, यानी आंसू पोछनेवाला.

तेतरी ने बड़ी मुश्किल से बेटे को पाला पोसा. जब थोड़ा बड़ा हुआ तो उसने काम में लगाने की बजाए स्कूल भेजने का फैसला किया. बेटा पढ़ने में कोई बहुत तेज तो नहीं था, लेकिन पढ़ता चला गया. किसी क्लास में फेल नहीं हुआ. बीए करने के साथ ही प्राइमरी स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई.

अब तेतरी की एक ही तमन्ना बची थी, जो शायद हर मां की होती है. बेटे के लिए एक अच्छी सी बहू लाना. ज्यादा दिक्कत भी नहीं हुई. लोरपोछन के नौकरी मिलते ही रिश्ते आने लगे थे.

एक सुंदर सी लड़की देख कर तेतरी ने रिश्ता पक्का किया और अगले ही लगन में दुल्हन घर भी आ गई.

सवा महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि बहू अपना असली रंग दिखाने लगी. बड़े नाज से तेतरी गोरी बहू लाई थी – और मोहल्ले में शान भी बघारती – लेकिन उस भोली सूरत और गोरे रंग के पीछे कितनी कालिख है उसने सोचा भी न था. यहां तक तो ठीक था – लोरपोछन की हरकतें भी अब तेतरी को रुलाने लगी थीं.

बेटा मां की बजाए बीवी की बात पर ज्यादा यकीन करने लगा था. जब बहू को समझ आ गया कि वो सास के खिलाफ बरगला सकती है तो वो पूरे फॉर्म में आ गयी.

तेतरी परेशान रहने लगी. इसी बीच जब बेटे के बाप बनने की खबर सुनी तो थोड़ी राहत मिली. उसे एक उम्मीद भी जगी कि शायद बहू अब सुधर जाए. तेतरी घर और बाहर के सारे काम करती और बहू दिन भर सोती.

जैसे से लोरपोछन के लौटने का टाइम होता इधर उधर ऐसे चक्कर काटना शुरू करती जैसे सारा काम वही करती हो. अब लोरपोछन भी मां को डांटने लगा था.

उस दिन तो हद ही हो गई जब बहू ठान कर बैठ गई कि जब तक तेतरी को घर से खदेड़ा नहीं जाता वो पानी भी नहीं पीयेगी. मोहल्ले के लोगों को ये सुन कर बड़ा ताज्जुब हुआ कि कैसे एक बहू जिसके बेटे की मां बनने जा रही हो वो उसी की मां को घर से बेदखल करने की साजिश रच रही हो.

डिलीवरी की तारीख नजदीक थी इसलिए बच्चे के लिए ये खतरनाक हो सकता था. लोरपोछन ने मां की जगह बेटे को तरजीह दी. बीवी की बात मानते हुए उसने मां को कहीं छोड़ आने का फैसला किया.

लोरपोछन मां को छोड़ने की तैयारी कर ही रहा था कि पत्नी को दर्द होने लगा इसलिए चारपाई पर लाद कर अस्पताल पहुंचे. बच्चा तो बच गया लेकिन मां को नहीं बचाया जा सका. इसके साथ ही तेतरी के घर से जाने का कार्यक्रम भी अपनेआप रद्द हो गया.

तेतरी के मन को भले ही ये अच्छा तो नहीं लगा कि एक दूधमुहां बच्चा बिना मां का हो गया – लेकिन उसकी आत्मा जरूर राहत महसूस कर रही होगी. तेतरी ने भूल सुधार के बारे में सोचा. उसने फिर से बेटे की शादी का फैसला किया. जब उसने ये बात लोरपोछन को बताई तो वो चहक उठा.

असल में वो तो खुद ही इस जुगाड़ में था, लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं समझ आ रहा था. चट मंगनी पट ब्याह के लिए माकूल माहौल था, जरूरत ही ऐसी थी. महीने भर के भीतर ही नयी बहू भी घर आ गयी. मजे की बात ये कि अगले ही दिन वो औकात पर उतर आई. सास के साथ नहीं रहना.

पिछली मुश्किलों को देखते हुए लोरपोछन ने नयी पत्नी को समझाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहा. थक हार कर एक दिन उसने पत्नी की बात मान लेने का फैसला किया. लोरपोछन ने मां के सामने गंगा स्नान का प्रस्ताव रखा – लेकिन उसने इंकार कर दिया क्योंकि इन बातों में दिलचस्पी उसकी बहुत पहले ही खत्म हो चुकी थी.

फिर भी जैसे तैसे समझाकर वो मां को बनारस ले गया. जब दोनों दशाश्वमेध घाट पर पहुंचे तो लोरपोछन ने मां से कहा कि वो डूबकी लगाए तब तक वो कहीं से कचौड़ी जलेबी लेकर आता है.

मां शाम तक इंतजार करती रही लेकिन लोरपोछन नहीं लौटा. बहुत रोयी चिल्लाई, सिर पटकी – लेकिन लोरपोछन तो घर पहुंचने वाला था.

उसे रोते देख एक बुढ़िया पास आई और समझाया कि बेटा अब कभी नहीं आने वाला. दरअसल, उसका बेटा भी कचौड़ी जलेबी लेने के लिए ही बोला था और फिर कभी नहीं लौटा. तेतरी को बुढ़िया की बात मान ली – और मान लिया कि आगे की जिंदगी अब घाट की सीढ़ियों पर ही गुजरनेवाली है.

उसे समझ नहीं आ रहा था कि जब वो अपनी कमाई से घर चलाने में सक्षम थी तो हालात ने उसे भीख मांगने को क्यों मजबूर किया. इसके साथ ही उसे उम्मीद थी कि एक दिन उसके बेटे को गलती का अहसास होगा – और वो उसे लेने जरूर आएगा.

उधर, लोरपोछन की दूसरी पत्नी भी बच्चे के जन्म के समय ही चल बसी. अब लोरपोछन के सामने बिन मां के दो बच्चों को पालने की समस्या खड़ी हो गई. लोरपोछन को मां का ख्याल आया. मोहल्ले में किसी के यहां बच्चों को छोड़कर वो मां को लेने बनारस पहुंचा.

कुछ दिन पहले ही उसे गांव के किसी ने बताया था कि उसने उसकी मां को बनारस में भीख मांगते हुए देखा. लोरपोछन तब साफ मुकर गया था – क्योंकि बनारस से घर लौटते वक्त उसने सिर मुड़वा लिये थे.

गांव आकर उसने बता दिया था कि उसकी मां गंगा में डूब गयी. लोगों का भरोसा जीतने के लिए उसने कर्मकांडों के साथ मां की तेरही भी की – और सबके साथ भोज-भात भी किया.

लोरपोछन सीधे दशाश्वमेध घाट पहुंचा. ऊपर से नीचे तक हर भीखमंगे को करीब से जाकर देखा. फिर शीतला घाट गया. उसके बाद अहिल्याबाई घाट, नारद घाट, चौकी घाट, केदार घाट होते हुए पैदल ही अस्सी तक गया.

कई मंदिरों के बाहर भीखमंगों की झुंड में भी उसने मां को खोजा लेकिन नाकाम रहा. थक हार कर वो लौट आया. जब मां नहीं मिली तो उसने तीसरी शादी का फैसला किया. वैसे शादी तो उसे करनी ही थी. बीवी की जरूरत उसे बच्चों से ज्यादा खुद के लिए थी.

कुछ दिन तक वो इधर उधर भटका भी. मां को खोजने के नाम पर वो दो तीन बार बलिया से बनारस गया भी लेकिन वो कैंट से दशाश्वमेध जाने की बजाए सीधे मंडुवाडीह के रेड लाइट एरिया में पहुंच जाता. कुछ देर के लिए तो वो अपनी परेशानी भुला जाता लेकिन ये उसे स्थाई समाधान नजर नहीं आता.

लेकिन मंडुवाडीह से लौटने वक्त वो सीधे स्टेशन नहीं जाता, बल्कि दशाश्वमेध जाकर डूबकी लगता. उसे लगता वो ठीक नहीं कर रहा इसलिए कुछ पाप धोने की कोशिश करता – और फिर किनारे बैठे भीखमंगों को पैसे देता. अब उसे अफसोस होने लगा था. वो प्रायश्चित करना चाहता था, लेकिन मौका नहीं मिल पा रहा था.

उस दिन उसने गौर किया कि एक बूढ़ी औरत पैसे के लिए अपना कटोरा तो बढ़ा रही है, लेकिन उसने मुहं फेर लिया. उसे कुछ शक हुआ. वो उसके पास बैठ गया. बुढ़िया जोर जोर से रोने लगी. उस दिन वो भी रोया.

जीभर के. मां-बेटे के गिले-शिकवे मिलते ही छू मंतर हो जाते हैं. लोरपोछन मां को लेकर घर आया. लोगों सवाल करें उससे पहले ही उसने कहानी गढ़ ली कि तब मां के नहीं मिलने पर वो मरा समझ कर लौट आया था. बाद में मल्लाहों ने उसे बचा लिया. जब वो बनारस पहुंचा तो मां को भीख मांगते देखा – और घर लेता आया. कहानी सुनाने के बाद लोरपोछन की इमेज भी सुधर गयी.

घर आने पर तेतरी को पता चला कि बेटे ने दूसरी शादी की और वो भी चल बसी. उसे बहुत दुख हुआ. खैर, जल्द ही दोनों इस नतीजे पर पहुंचे कि घर में फिर से नयी बहू लानी चाहिए.

अब तो न पंडित की जरूरत थी न लगन की. मंगनी भी नहीं बस ब्याह. हफ्ते भर के भीतर नई बहू हाजिर. एक और हफ्ते के भीतर तीसरी बहू के तेवर पहले से भी तीखे.

अगला हफ्ता आने से पहले लोरपोछन ने फिर से मां के सामने गंगा स्नान का प्रस्ताव रखा – और मां फिर से दशाश्वमेध पहुंच गयी. इस बार लोरपोछन ने कोई धोखा नहीं दिया – बोला और लाकर कचौड़ी जलेबी खिलाया भी. फिर पैर छूकर विदा लिया.

किसकी किस्मत किस पर भारी पड़ रही थी, किसी को पता नहीं चल रहा था. साल भर के भीतर ही लोरपोछन के तीसरे बेटे ने जन्म लिया – और वो भी बिन मां का बच्चा हो गया. बिन मां के तीन बच्चों को पालना कितनी टेढ़ी खीर होगी – लोरपोछन के अलावा भला कौन समझ पाता.

बच्चे को संभालने के लिए किसी रिश्तेदार को बुलाया और मां को लेने बनारस पहुंचा. इस बार मां ने घर लौटने से इंकार कर दिया. तेतरी बहुत गुस्से में थी, साफ कह दिया कि तुझे मेरी कोई जरूरत नहीं है.

जा तू फिर से शादी कर ले – और जैसे मन करे तू रह. लोरपोछन जानता था कि ममता के आगे हर मां मूर्ख बनने को मजबूर होती है. उसने इसका फायदा उठाया और रो-गाकर वापस घर लाया.

तीन तीन बच्चों के साथ वक्त का तो पता नहीं चलता. तेतरी फिर से घर के काम के साथ साथ पुश्तैनी धंधे में भी जुट गयी. एक दिन तेतरी खाना बना रही थी तभी लोरपोछन का सबसे छोटा बेटा आंवें की तरफ चला जा रहा था.

मोहल्ले के किसी ने देख लिया और पकड़ लिया. बड़ा हादसा टल गया. इतने के बावजूद न तो लोरपोछन और न ही तेतरी कोई भी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि घर में चौथी बहू आये. लेकिन कब तक? तेतरी की बात और थी, पर लोरपोछन कैसे रह पाता. उसके लिए तो हर दिन भारी पड़ रहा था.

घटना वाले दिन ही शाम को मोहल्ले के एक शख्स ने लोरपोछन के सामने फिर से ब्याह कर लेने का सुझाव दिया. बातचीत चल ही रही थी कि तेतरी भी वहां पहुंच गयी तो उसने अपने एक रिश्तेदार की बेटी के बारे में भी बताया.

मजबूरियां ऐसी थीं कि तेतरी एक और बहू के लिए तैयार हो गयी.
जब नई बहू के मां बनने की खबर सुनी तो वही शख्स जिसने शादी कराई थी घर आया. उसने बहू को डॉक्टर से दिखाने की सलाह दी.

जांच के बाद डॉक्टर ने लोरपोछन को समझाया कि अगर उसने इलाज कराया होता तो उसकी पहली पत्नी भी बच गयी होती – और शायद बाद की मुश्किलें भी न आतीं. मई के महीने में ड्यू डेट आने पर सीजेरियन ऑपरेशन हुआ – इस बार सब कुछ अच्छा था.

ऐसा पहली बार हुआ कि जच्चा और बच्चा दोनों खुशी खुशी घर लौटे. जीवन नये सिरे से चलने लगा. साल भर बीत भी गये. ये पहला मौका था जब किसी बच्चे का बर्थ डे मनाये जाने की तैयारी हो रही थी.

बर्थ डे मई के दूसरे संडे को आने वाला था. ठीक एक दिन दिन पहले लोरपोछन की पत्नी और उसकी मां के बीच खूब झगड़ा हुआ. तब लोरपोछन स्कूल गया हुआ था.

वैसे भी वो काफी दिनों से बाकी बच्चों और मां को कहीं भेजने के लिए लोरपोछन पर दबाव डाल रही थी. उसे लग रहा था कि सभी बच्चे रहे तो संपत्ति का बंटवारा हो जाएगा. अगर उसके सौतेले बेटों को कहीं भेज दिया जाए तो सब कुछ उसके बेटे का हो जाएगा.

लेकिन इस काम में उसकी सास ही सबसे बड़ी बाधा थी. लिहाजा, उसने शर्त रखी कि अगर बच्चों और बुढ़िया को घर से नहीं निकाला तो वो कुएं में डूब कर जान दे देगी. लोरपोछन सब बातों के लिए तो तैयार था लेकिन बीवी की मौत उसे किसी भी सूरत में मंजूर नहीं थी.

फिर भी वो उसमें समझाने की कोशिश करता रहा. जब बहू ने देखा कि दाल नहीं गलने वाली क्योंकि वे बच्चे तो लोरपोछन के ही हैं – फिर उसने सास को घर से खदेड़ने की जिद पकड़ी.

तेतरी को भी समझ आ गया कि उस घर में उसका आखिरी दिन है. बेटा बहू की बात मानकर उसे फिर से भीख मांगने के लिए बनारस छोड़ आएगा. तेतरी मन ही मन खुद को तैयार कर रही थी. लोरपोछन उस दिन स्कूल से जल्दी लौटा, लेकिन तुरंत ट्यूशन पढ़ाने चला गया.

जब घर लौटा तो बहू ने बखेड़ा शुरू कर दिया. तेतरी चुपचाप घर के बाहर चली गयी. देर शाम लौटी और सीधे अपने कमरे में घुस गयी. उसने पाया कि बेटा, बच्चे और बहू सभी सो चुके हैं.

उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. कहां पहली बार खुशी का ऐसा मौका आया था और कहां घर में कोहराम मचा हुआ था. तेतरी ने चुपके से भोर में ही घर छोड़ देने का फैसला किया.

उसने कुछ सामान एक गठरी में बांध लिये और सोने की कोशिश की, लेकिन नींद आए कहां से. जब सुबह होने का अहसास हुआ तो उसने गठरी उठाई और बाहर निकली. घर के पास गली में घुसी ही थी कि देखा सामने से लोरपोछन आ रहा है.

उसके हाथ में लाठी देखकर वो डर गयी. लोरपोछन ने बताया घर के पास दो सांड़ लड़ रहे थे उन्हें खदेड़ने गया था. मां को गठरी लिये हुए देख उसे शक हुआ. उसने पूछा तो तेतरी ने बताया कि गंगा स्नान का मन हो रहा था इसलिए जा रही थी.

लोरपोछन ने कहा ठीक है. तेतरी जैसे ही चलने को हुई तो कहा – बने रहो खूब फूलो फलो. दोनों अपनी अपनी ओर बढ़ गये. मां ने ऐसे आशीर्वाद क्यों दिये – उसे कुछ शक हुआ. उसने पलट कर आवाज दी – माई!

लोरपोछन का शक सही निकला. पहले तो तेतरी इंकार करती रही लेकिन जब लोरपोछन ने अपनी कसम देकर पूछा तो उसने बक दिया. लोरपोछन मां को घर लाया और बीवी को खूब डांटा. लोरपोछन को भी शायद अहसास हो चुका था.

वो बहुत थका हुआ महसूस कर रहा था. बीवी पर उसकी डांट का असर होना तो दूर वो जिद कर बैठी कि अब तो केक तभी कटेगा जब सास को घर से खदेड़ा जाएगा. अब लोरपोछन का गुस्सा बेकाबू हो रहा था.

उसने सोचा कुछ भी हो मां को तो नहीं छोड़ेगा. स्कूल तो नहीं जाना था लेकिन ट्यूशन में कहां संडे होता है. वो पढ़ाने चला गया. घर के पास ही था कि उसे याद आया वो पेन लेना भूल गया है. घर लौटा तो वो सीन देख कर उसके होश उड़ गये.

बहू सास को डंडे से पीट रही थी. तेतरी ने बेटे को देखा तो और डर गई – कहीं दोनों मिल कर न उसे पीटने लगें. लेकिन वैसा नहीं हुआ.

लोरपोछन ने डंडा छीन कर फेंका और बीवी के बाल पकड़ कर घसीटते हुए घर से बाहर कर दरवाजा अंदर से बंद कर दिया. उसने मां के पैर पकड़े – माफी मांगी. शायद अब भी लोरपोछन को मां की असलियत नहीं पता थी – अरे, मां तो गलती करने से पहले ही बेटे को माफ कर चुकी होती है.

बहू ने बाहर खूब शोर मचाया. उसे लगा उसकी चीख सुन कर सहानुभूति जताते हुए पूरा मोहल्ला जुट जाएगा, लेकिन कोई उसके पास नहीं पहुंचा. यहां तक कि जिस रिश्तेदार ने उसकी शादी कराई थी वो भी नहीं. जब वो उनके घर गई तो उन्होंने भी दरवाजे बंद कर लिये.

मायके में भी उसे किसी ने घास नहीं डाली. वे बोले कि उसे घर में रखा तो छोटी बेटियों से शादी कौन करेगा. जब कहीं ठिकाना नहीं मिला तो उसने भी बनारस की ट्रेन पकड़ ली.

शाम को लोरपोछन ने अपनी मां और बच्चों के साथ केक काटा. बेटे को बर्थ डे विश करने की बजाए उसने मां को विश करना ज्यादा सटीक लगा – और वो बोला, “हैपी मदर्स डे.” तभी से मई महीने के दूसरे संडे को भारत में भी मदर्स डे मनाया जाने लगा. आप सभी को भी, “हैपी मदर्स डे!”

[ END ]


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सत्या एस. दूबे | Satya S. Dubey
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[ABOUT THE AUTHOR: Satya S. Dubey loves storytelling, apart from cooking, shopping and travelling incessantly. She spares most of her time in conceptualizing different form of fiction including children and inspirational stories. A short film ‘SOUR’, based on her story was released recently. She lives in NCR with her spouse and a pet among other people who let her feel very special.]

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