देशद्रोही और उनसे मोर्चा लेते मोतीराम

देशद्रोही और उनसे मोर्चा लेते मोतीराम

मोतीराम हर उस शख्स को ‘देशद्रोही’ मानते जो उनकी फिलॉसफी से इत्तेफाक नहीं रखता, लेकिन कोई उन्हें ‘देशभक्त’ होने का तमगा दे ये भी उन्हें मंजूर न था.

वो हर किसी से एक जैसा बराबरी का व्यवहार करते हैं और हर बात में एक ही कविता सुनाते, ‘न कोई छोटा है न कोई बड़ा, मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है.’

गीता की तरह धूमिल की किताब ‘संसद से सड़क तक’ हमेशा साथ रखनेवाले मोतीराम कहते हैं, ‘ये कविता नहीं, गीता-सार से भी बढ़कर है. बस समझने की जरूरत है. ऐसा कौन सा मंत्र है जो इसमें नहीं है.’ उन्हें लेकर कोई क्या सोचता है मोतीराम को इस बात की शायद ही कभी परवाह रही हो.

शुरू में माला भी उन्हें बात बात पर चुनौती देती – लेकिन ज्यादा वक्त नहीं लगा. शादी के कुछ ही दिन बाद माला भी मोतीराम की फैन हो गईं. अब तो अगर कोई उनके सामने सिर उठाने की कोशिश करता दोनों मियां-बीवी एक साथ टूट पड़ते – और उसे चुप करा कर ही दम लेते.

‘कंजूस.’ बस यही वो शब्द है जिससे मोतीराम को सबसे ज्यादा चिढ़ है. उनका सबसे बड़ा दुश्मन वही है जो उन्हें लखीमाल और किरोड़ीमल के खानदान का बताने की कोशिश करता है. ऐसी स्थिति में बड़ी ही संजीदगी के साथ मोतीराम एक बेहतरीन डिस्क्लेमर पेश करते हैं, “भई, समझने की कोशिश क्यों नहीं करते. मैं कंजूस नहीं, फिजूलखर्ची के खिलाफ हूं.”

जब तक मजबूरी थी, मोतीराम और माला किराये के फ्लैट में गुजारा करते रहे. अपने घर का सपना मोतीराम ने भी पाल रखे थे लेकिन उसकी भी अलग वजह रही. ‘चैरिटी बिगिन्स ऐट होम…’ के पक्के फॉलोवर मोतीराम के दिमाग में घर का भी नक्शा बिलकुल अनोखा था. इसीलिए जब मकान बना तो उसे अपने तरीके से बनवाया. सिर्फ बाहर की चार दीवारें और उन पर छत.

अंदर बड़ा सा हाल – बस यही था मोतीराम और माला के सपनों का घर. घर के अंदर अगर अलग से कोई दीवार और दरवाजा थे तो सिर्फ बाथरूम की दीवार और उसी का एक पल्ले का दरवाजा.

घर के अंदर मोदीराम की पसंद के अनुसार माला ने खुद सारे पर्दे सिल कर तैयार किये और दोनों ने मिल कर उन्हें जगह जगह खूंटी के सहारे टांग दिया. अब दीवारों के स्थान पर जगह जगह पर्दे मिल कर कमरों का लुक देने लगे.

मोतीराम और माला का घर तैयार होने में बेहद कम वक्त लगा.
असल में “मोतीराम-दर्शन” के अनुसार दीवारें घर के अंदर हवा और रोशनी की राह में बाधा बनती हैं. मोतीराम का घर बाहर से देखने में तो बाकियों जैसा ही लगता लेकिन अंदर हर वक्त मनमाफिक इंटीरियर डेकोरेशन का मौका बना रहता.

मोतीराम को घर में जब जरूरत महसूस होती पर्दे खींच कर किनारे कर दिये जाते और पूरा घर हवा और रोशनी से भर जाता. अगर कभी उन्हें लगता कि बच्चों का कमरा जहां है वहां नहीं बल्कि दूसरे कोने में होना चाहिए तो झट से घर का इंटीरियर माडिफाई कर लेते. बस एक ही जगह कोई तब्दीली संभव नहीं हो पाती – बाथरूम में.

घर में हर तरह की आधुनिक सुख सुविधाएं हैं लेकिन उनके इस्तेमाल के लिए नियम बने हुए हैं. वजह वही – फिजूलखर्ची. फिजूलखर्ची से बचने के लिए मोतीराम ने सैकड़ों नियम बना रखे थे. इन नियमों का वो खुद तो पालन करते ही, जहां तक हो पाता आस पड़ोस को भी अपनी बात समझाने की कोशिश करते.
मोतीराम के घर भी सुबह की शुरुआत बाकी घरों की तरह होती है. सब लोग बारी बारी टॉयलेट जाते हैं. पहले कौन जाएगा इसका कोई नियम नहीं है – स्वाभाविक तौर पर जिसे जल्दी हो पहले वही जाएगा.

इस बात को लेकर भी कोई पाबंदी नहीं है कि कौन कितनी देर तक अंदर रह सकता है. ये सब वैसे ही तय होता है जैसे किसी भी परिवार में होता होगा. जो पहले जाना चाहे. जिसे जितनी देर रहना पड़े. हां, इमरजेंसी में अगर प्रेशर बना हो तो वो शोर मचा कर अंदर वाले पर जल्दी आने के लिए प्रेशर बना सकता है.

नियम लागू होता है बाहर आने के बाद. निकलते के बाद सब लोग साबुन से हाथ धोते हैं फिर आगे बढ़ते हैं. मोतीराम के घर भी वैसे ही होता है लेकिन तरीका थोड़ा अलग है. लोग बाथरूम जाते और आते तो बारी बारी ही हैं लेकिन हाथ धोने के लिए सबको इंताजर करना पड़ता है.

जब सब लोग आ जाते हैं तो मोतीराम अपने हाथ में लिक्विड सोप लेते हैं और फिर बारी बारी सभी के हाथों में साबुन लगा कर मलते हैं.

पहले मोतीराम को सिर्फ अपना और माला के हाथ मलने होते थे – बाद में इस इवेंट में दोनों बच्चे भी शामिल हो गये. माला को पहले तो अजीब लगा लेकिन फिर उन्हें भी आदत पड़ गई. रही बात बच्चों की तो उन्हें तो इसमें खूब मजा आता.

एक का हाथ मोतीराम मलते हैं तो दूसरा इंतजार करता रहता है. “पापा थोड़ा और, थोड़ा और…” उनका मन ही नहीं भरता. जब ज्यादा जिद करते तो कभी कभी तो बच्चों को डांटना भी पड़ता है.

फिर सब नल के पास पहुंचते. सब एक के नीचे एक हाथ रखते हैं. नल से धीरे धीरे पानी गिरता है. यहां भी सबसे ऊपर हाथ होने की होड़ मचती है – और बात बच्चों की मानी जाती है.

सबसे ऊपर बड़ी बेटी का हाथ होता है उसके नीचे बेटे का फिर मोतीराम और सबसे नीचे माला. इस तरह एक ही वक्त थोड़े से ही पानी में सभी लोग हाथ धो लेते हैं.

इस बीच अगर पड़ोस का कोई बच्चा आता तो उसे भी देख कर मजा आता. अब घर जाकर वो भी वैसे ही साबुन लगाकर हाथ मलने और साथ में हाथ धोने की जिद करता. बच्चों के आगे तो हर मां-बाप मजबूर होते हैं, इसलिए मजबूरन उन्हें भी वैसे ही करना पड़ता.

इसको लेकर कभी कभी मोतीराम और माला की पड़ोसियों से बहस भी हो जाती. उन्हें बुरा तो लगता लेकिन सोचते चलो इसी बहाने फिजूलखर्ची पर रोक तो लग रही है.

जब नहाने की बारी आती तो पहले बाथ टब भर कर उसमें बॉडीवाश मिलाया जाता. पहले बारी बारी सब लोग साबुन के घोल में डूबकी लगाते और बाहर खड़े होकर इंतजार करते. साबुन के बाद उसमें साफ पानी भरा जाता. फिर सब लोग बारी बारी साफ पानी से नहाते.

आखिर में सब लोग एक साथ शॉवर के नीचे खड़े होते और साफ पानी से साथ नहाते – ताकि कम से कम पानी में सबका काम चल जाए और पानी की बचत हो सके.

निपटने और सामूहिक स्नान की ये अनोखी स्टाइल पास पड़ोस होते हुए धीरे धीरे मोहल्ले के बाकी घरों में भी फैलने लगती है. महामारी की तरह फैलने वाली इस अच्छी बीमारी के विस्तार में बच्चे ही कैरियर की भूमिका निभाते हैं.

खाने के मामले में भी मोतीराम ने कुछ सख्त नियम बना रखे थे. खाने से पहले सभी को पानी पीना होता. कम से कम एक गिलास – कोई ज्यादा पीना चाहे तो उस पर पाबंदी नहीं थी.

इसके लिए सभी को एक एक गिलास मिला होता है. पानी पीने के बाद सब लोग अपने गिलास ढक कर रख देते. ऐसा करने से न तो बार बार गिलास धोना होता न पानी की बर्बादी होती.

खाना बन जाने के बाद एक बड़ी सी थाली में सबका खाना निकाला जाता. सब लोग एक साथ बैठकर खाना खाते. खाने पर कोई रोक नहीं थी. शुरू में सबको एक बार याद जरूर दिला दिया जाता कि भूख से थोड़ा कम खाना ही बेहतर होता है – इससे बदहजमी से तो बचा ही जा सकता है दूसरी बीमारियों का भी खतरा टल जाता है.

मोतीराम की राय में इस तरह एक साथ खाने से एक दूसरे के प्रति प्यार और भरोसा तो बना ही रहता है – बर्तन धोने में साबुन और पानी की भी बचत होती है. हां, खाने के बाद भी सब लोग एक ही साथ एक दूसरे के नीचे हाथ रख कर नल के नीचे धोया करते.

घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. शहर के बीचों बीच मोतीराम की मौके की बढ़िया दुकान थी. चलती भी खूब थी. लोग मोतीराम के यहां से आंख मूंद कर सामान ले जाते. अगर कोई सामान लेते तो उन्हें कंपनी की वारंटी से ज्यादा मोतीराम की बात पर भरोसा होता.

मोहल्ले में मोतीराम के शुभेच्छु तो सभी थे लेकिन उनका मजाक भी खूब उड़ाया जाता. कुछ लोग तारीफ भी करते – लेकिन शायद ही कोई ऐसा होता जो खुलेआम उनकी तारीफ कर पाता.

मोतीराम को भी ये बात भली भांति मालूम थी कि लोग उनका मजाक उड़ाते हैं लेकिन वो शायद ही कभी इस ओर ध्यान देते. अगर कोई उन्हें जलील करने की कोशिश करता तो वे कभी चुप न रहते. लोग उनसे कहा करते कि पैसे बचाने की बात तो समझ में आती है, लेकिन ये पानी और बिजली बचाने में इतनी एनर्जी क्यों लगाते हैं.

मोतीराम कहते कि पैसे तो बच्चे कमा लेंगे, लेकिन बिजली और पानी वो कहां से लाएंगे – इसलिए जरूरी है कि बचत में बिजली पानी को भी शामिल किया जाए. ऐसी बातें बोल कर मोतीराम हर किसी को चुप करा देते.

रात में सोने को लेकर भी छोटे मोटे नियम बने हुए थे. गर्मियों में भी सब लोग एक ही कमरे में सोते. बिस्तर फर्श पर ही लगाया जाता. सबसे नीचे बड़ी सी कार्पेट और उस पर चादर बिछा दी जाती. इस तरह एक ही एसी से काम चल जाता. एसी भी कुछ देर चलाने के बाद बंद कर दिया जाता. इस तरह बिजली की फिजूलखर्ची रोक ली जाती.

घर तो ऐसा बना ही होता है कि रोशनी के लिए भी देर शाम से पहले बिजली की जरूरत न पड़े. बिजली की खपत के नाम पर देर तक बस एक ही बल्ब जलता वो भी मंदिर का. उसे भी मोतीराम तड़के उठकर ऑफ कर देते. फिर टहलने निकल पड़ते.

टहलना भी मोतीराम का मल्टीपर्पज ही होता. वो नहीं चाहते कि पड़ोस में भी फालतू में कोई बल्ब जलता रहे. इसके लिए वो पड़ोसियों के दरवाजे खटखटा कर ‘गुड मॉर्निंग’ बोलते और बाहर की बत्ती बुझाने के लिए रिक्वेस्ट करते.

कुछ लोग तो दरवाजा खोलते और मुस्कुराते हुए उनकी बात मान कर बत्ती बुझा देते. कुछ लोग कितना भी खटखटाने या कॉलबेल बजाने पर दरवाजा नहीं खोलते जबकि कुछ उनसे झगड़ा करने लगते, “बड़े आए हैं गांधी जी के चेले बन कर. पागल कहीं के… ” ये सब मोतीराम के लिए आम बात थी, लेकिन वो अपने मिशन में जुटे रहते.

कुछ दिन बाद लोगों ने मोतीराम के नॉक करने पर जब दरवाजा खोलना या बत्ती बुझाना बंद कर दिया तो उन्होंने नया तरीका खोज निकाला. जिसके घर के बाहर की बत्ती दिन में जलते देखते वो पत्थर मार कर तोड़ देते.

उन्हें लगता बिजली के मुकाबले बल्ब तोड़ना छोटा नुकसान है. मोतीराम का ये तरीका काफी कारगर साबित हुआ. कुछ लोगों ने तो बाहर बल्ब लगाना ही छोड़ दिया जबकि बल्ब टूटने के डर से कुछ लोग खुद ही उठ कर समय से बत्ती बुझा देते.

एक दिन मोतीराम ने देखा गली के आखिरी मकान की बत्ती देर तक जल रही है. मोतीराम ने सोचा पास जाकर याद दिला देते हैं शायद घर के लोग बत्ती बुझाना भूल गये होंगे. जैसे ही मोतीराम गेट के पास पहुंचे उन लोगों ने झगड़ा करना शुरू कर दिया. देखते देखते मोहल्ले के सारे लोग जुट गये.

उस दिन लोगों ने मिल कर मोतीराम को धमकाने की भी कोशिश की. उन्होंने मोतीराम से कहा कि वे उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत करेंगे और उन्हें जेल भिजवा देंगे. मोतीराम चुप रहे. मोतीराम को लगा कि सब मिल कर पुलिसवालों को भी खिला-पिला कर अपने पक्ष में कर लेंगे और फालतू में उनका वक्त और ऊर्जा दोनों जाया होगी.

इतने में किसी ने फोन कर पुलिस को भी बुला लिया. पुलिस को देख कर एक बार तो मोतीराम डर गये लेकिन उन्होंने हिम्मत न छोड़ी.
एक पल के लिए उन्हें लगा वो चारों ओर से देशद्रोहियों से घिर गये हैं.

एकबारगी मोतीराम को लगा देश की आजादी तो खतरे में है. अगर वो डर कर पीछे हटे तो देश फिर से गुलाम हो जाएगा.

फिर उन्हें लगा जिस बिजली पानी को बचाने के लिए वो लड़ाई लड़ रहे हैं वे तो उनके साथ खड़े होंगे ही – और कोई हो या ना हो.
‘मोतीराम तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं.’

मोतीराम के कानों में नारा गूंजने लगा. उन्हें लगा बिजली-पानी तो उनके समर्थन में नारे भी लगा रहे हैं. उन्हें लगा वो कुछ गलत तो कर नहीं रहे. जो सही लगता है करते हैं. सच्चाई का रास्ता थोड़ा मुश्किल तो होता ही है. उन्होंने खुद को संभाला.

“ठीक है. आप लोग मुझे जेल भिजवा दीजिए. कोर्ट में पेशी के दौरान मैं भी जज को बताऊंगा कि किस तरह मोहल्ले के लोग बिजली की चोरी करते हैं? पानी की भी बर्बादी होती है.

जब कोर्ट जांच का आदेश देगा तो सबकी कारगुजारी सामने आ जाएगी कि कौन चोरी की बिजली इस्तेमाल कर रहा है? किसने पानी का गैरकानूनी कनेक्शन ले रखा है? किसने नक्शा कुछ और पास कराया और घर किसी और तरीके से बनवाया है? और ये सब कैसे पुलिसवालों की मिलीभगत से हो रहा है?”
मोतीराम के इतना बोलते ही पुलिसवाले चुपके से खिसक लिए. मोहल्ले के लोगों के भी तेवर बदल गये. जो लोग झगड़ा कर रहे थे उन्होंने भी पैंतरा बदल दिया. पीछे खड़े कुछ लोग नारे भी लगाने शुरू कर दिये.

‘हमारा नेता कैसा हौ?’ भीड़ में से ही एक आदमी बोला. बाकियों ने सुर में सुर मिला दिये, ‘मोतीराम जैसा हो!’

एक लड़का मोहल्ले में लोगों के यहां पूजा के लिए फूल माला पहुंचाया करता था. भीड़ देख कर वो भी बातें सुन रहा था. किसी की नजर पड़ी और उसके हाथ से माला लेकर उसने मोतीराम के गले में डाल दिया. नारेबाजी और तेज हो गई.

“सुनिए, मेरी बात सब लोग सुनिए. ये सब करने से मैं नेता नहीं बनने वाला… ”

मोतीराम की बात सुन कर सब लोग चुप हो गये. फिर मोतीराम ने समझाया कि ये सब उन्होंने नेता बनने के लिए नहीं किया. अगर वे वाकई उनकी बात से सहमत हैं तो सब ऐसी कोशिश करें कि किसी भी तरह से फिजूलखर्ची से बचा जा सके.

जैसे तैसे लोगों को समझा बुझाकर मोतीराम घर लौटे और फिर जल्दी से तैयार होकर दुकान पहुंचे. देर काफी हो चुकी थी – कुछ लोग सामान के लिए इंतजार कर रहे थे. फिर दुकानदारी में व्यस्त हो गये.

थोड़ा थका महसूस कर रहे थे इसलिए शाम को उन्होंने दुकान थोड़ा जल्दी बढ़ा दी. सर्दियों में वैसे भी बाजार जल्दी ही बंद हो जाते हैं.
मोतीराम ने सर्दियों के लिए भी कुछ अलग नियम बना रखे थे.

मोतीराम को सबसे बड़ी फिजूलखर्ची गर्म कपड़ों की खरीदारी लगती. वो सोचते कि महज दो महीने के लिए आखिर इतने पैसे खर्च करने का क्या मतलब. सर्दियों में सोने को लेकर भी नियम बना हुआ था. एक ही बेड पर सब लोग सोते. बचपन में मिले साइंस के ज्ञान का भी वो पूरा फायदा उठाते. फिजूलखर्ची से बचने के लिए सब लोग एक ही बेड पर बड़ी सी रजाई ओढ़कर सोते.

कपड़ों के मामले में भी मोतीराम ने कुछ बातें तय कर रखी थीं. माला और बच्चों के लिए तो वो शॉल और स्वेटर खरीद भी देते लेकिन अपने लिए कुछ भी नहीं लेते. गर्मियों में धूप और गर्म हवा के थपेड़ों से बचाने वाला गमछा ही सर्दियों में उनका मफलर और चादर बना रहता. माला को ये बात अच्छी नहीं लगती. माला जब भी कुछ बोलना चाहतीं मोतीराम समझ जाते और उन्हें चुप करा देते.

ठंड से बचने के लिए वो तमाम अल्टरनेटिव तरीके अपनाते. दुकान पर बैठे अगर ठंड लगती तो वो कुछ दूर तक टहल कर आ जाते. उन्हें लगता इससे ठंड से तो बचाव होता ही सेहत भी दुरूस्त रहती.

अगर सड़क पर टहलने से बात नहीं बनती तो वो बिल्डिंग की सीढ़ी पर कई बार चढ़ उतर लेते. अगर इतने से बात नहीं बनती तो थर्मस में गर्म पानी भरकर रखते और बीच बीच में पीते रहते.

उस दिन सुबह मोतीराम उठे तो ठंड थोड़ी ज्यादा लगी. सुबह हो चुकी थी, उन्होंने बत्ती बुझाई और टहलने निकल पड़े. टहलते वक्त उन्हें लगा कि ठंड थोड़ी ज्यादा है, इसलिए तेज कदमों से चलने लगे.

फिर भी ठंड लग रही थी तो उन्होंने दौड़ना शुरू कर दिया. कुछ ही देर दौड़े होंगे कि उनकी सांस फूलने लगी. फिर उन्हें याद आया कि रात में भी उन्होंने खाना नहीं खाया था इसलिए भूख सी भी लग रही थी.

दरअसल, दिन में उन्हें दावत में जाना पड़ा था, इसलिए रात को खाना भी नहीं खाये थे. मोतीराम ने एक नियम ये भी बना रखा था कि अगर कहीं लंच के लिए जाना पड़ता तो वो डिनर स्किप कर देते. डिनर के मामले में भी उनका यही रवैया रहता – अगले दिन लंच नहीं करते. मोतीराम का मानना था कि ऐसा करने से बीमारियों के साथ साथ अन्न की भी फिजूलखर्ची से बचना हो जाता है.

धीरे धीरे चलने पर ठंड लगी तो उन्होंने फिर दौड़ने की कोशिश की. बढ़ती उम्र और खाली पेट होने के कारण वो गिर पड़े. संयोग से उनके एक पड़ोसी किसी को स्टेशन छोड़ कर घर लौट रहे थे. उन्होंने मोतीराम को गाड़ी में बिठा कर घर पहुंचाया. घर पहुंचते पहुंचते मोतीराम बेहोश हो गये. फौरन डॉक्टर को बुलाया गया.

सुबह सुबह की ही बात थी इसलिए लोग बिस्तर से उठे ही थे जब उन्हें पता चला कि मोतीराम के घर डॉक्टर बुलाना पड़ा है. हर कोई इसी बात से हैरान था. अब तक न तो कभी मोतीराम, माला या बच्चों को डॉक्टर के पास जाते किसी ने देखा था न कभी उनके बीमार होने की बात सुनी थी.

माला की परेशानी अलग थी. उनकी तबीयत ठीक होने पर वो कैसे बताएंगी कि डॉक्टर को कितनी फीस देनी पड़ी और दवा में कितना खर्च हुआ?

माला और बच्चों सभी को मोतीराम इस बात की भी ट्रेनिंग दे रखे थे कि अगर कोई बेहोश हो जाए तो उसे होश में लाने के लिए क्या उपाय करने चाहिए. वो हमेशा इस बात पर जोर देते थे कि रोगों से बचाव इलाज से बेहतर है – डॉक्टर के यहां जाना या दवा खाना तो सबसे बड़ी फिजूलखर्ची थी.

मोतीराम को होश आया तो सबसे पहले उनकी नजर माला के चेहरे पर पड़ी. बिलकुल खामोश. दूसरी तरफ देखा तो ड्रिप चल रही थी.

मोतीराम ने माला की ओर देखा. आहिस्ते से उनका हाथ पकड़ा – और झपकती पलकों से जैसे हामी भरी. “दरअसल, भूल गया था कि मैं भी एक जोड़ी जूता ही हूं – और मुझे भी मरम्मत की जरूरत कभी न कभी पड़ सकती है.”

[ END ]


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सत्या एस. दूबे | Satya S. Dubey
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[ABOUT THE AUTHOR: Satya S. Dubey loves storytelling, apart from cooking, shopping and travelling incessantly. She spares most of her time in conceptualizing different form of fiction including children and inspirational stories. A short film ‘SOUR’, based on her story was released recently. She lives in NCR with her spouse and a pet among other people who let her feel very special.]

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