गुना – एक लव स्टोरी

गुना – एक लव स्टोरी

तमाम रस्में होते होते वक्त आधी रात का पड़ाव पार कर चुका था. मंडप में फेरे चल रहे थे. फेरे पूरे हुए तो आचार्य ने अक्षत छिड़कते हुए वर-वधू को आशीर्वाद दिया.

“आप दोनों को बहुत बहुत बधाई! आज से आप पति-पत्नी हैं और एक दूसरे के सबसे करीबी साथी भी हैं.”

तनुश अपने चेहरे से सेहरा हटाता है. गुना भी घूंघट उठाती है. तनुश को देखते ही गुना के होश ही उड़ गये.

गुना पूछती है, “तुम कौन?”

गुना के इस व्यवहार से तनुश भी भौंचक्का रह जाता है. तनुश अभी कुछ बोलता कि गुना पूछ बैठती है. गुना गुस्से में कांपती होती है.

गुना – “उदेश कहां है?”

तनुश भी इधर उधर देखता है. उदेश कहीं दिखायी नहीं दे रहा है. गुना जोर जोर से आवाज देने लगती है.

“उदेश, उदेश…”

तनुश को भी कुछ समझ नहीं आता. उसके मन में तमाम खयालात आते हैं. फिर भी वो समझ नहीं पाता कि जिससे उसकी शादी हुई है वो उसके भाई का नाम लेकर ऐसे क्यों चिल्ला रही है? वो भी ऐसे जैसे उसने कोई बड़ी गड़बड़ी कर दी हो.

तनुश ने तो उदेश की जिद के चलते ही शादी के लिए हामी भरी थी. तनुश ने ये भी जानने की कोशिश नहीं की कि उसके लिए किसी हमसफर की तलाश हो रही है या कोई गले पड़ने वाला है. इतने में उदेश भी आ जाता है.

तनुश अभी कुछ बोल पाता उससे पहले ही गुना उस पर झपट पड़ती है.

“ये क्या तमाशा है? मेरी शादी किससे करा दी?”

गुना खूब जोर जोर से रोती और चिल्लाती है. उदेश पर ऐसे टूट पड़ी है जैसे उसका जान लेकर ही दम लेगी. तनुश अपनी जगह खड़े खड़े देखता है. अचानक जो कुछ होने लगा देखकर तनुश क्या उसकी जगह कोई भी होता तो शायद ही उसे कुछ समझ आता. उदेश को घसीटते हुए गुना कुछ दूर तक ले जाती है – और पूछती है.

“आखिर तुमने ऐसा क्यों किया? मुझे इतना बड़ा धोखा क्यों दिया? किस बात का बदला लिया है तूने?”

तनुश पहले चुपचाप देखता है लेकिन उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा. आखिर उसकी पत्नी उसी के भाई के साथ ऐसा कैसे कर सकती है.
तनुश दोनों के पास पहुंच कर पूछता है, “तुम ये तमाशा क्यों कर रही हो?”

तनुश के बोलने पर गुना एक पल के लिए कुछ सोचती है. फिर शांत हो जाती है. तनुश को गुना का ये व्यवहार अच्छा लगता है. उदेश से तनुश पूछता है.

“बोल उदेश, सच में ये क्या तमाशा है? ये किस धोखे और बदले की बात कर रही है?”

अब तक जो सवाल गुना उदेश से पूछ रही थी, वही सवाल तनुश पूछ रहा है. गुना को लगता है कि तनुश की बात मान कर उसने बहुत अच्छा किया है.

ऐसे वाकये कम ही होते हैं जब तमाशा और मर्यादा एक दूसरे को कॉम्प्लिमेंट देते नजर आयें.

तनुश को उदेश शांत रहने का इशारा करता है और उसके बाद समझाने का प्रयास करता है.

“भाई, प्लीज. पहले मेरी बात ध्यान से सुनो.”

अभी तक गुना तनुश को उदेश का दोस्त समझ रही थी. ज्यादा हैरानी तब होती है जब उसे समझ आता है कि दोनों सगे भाई हैं.

उदेश दोनों की तरफ एक साथ देखते हुए बोलता है, “आप दोनों का गुनहगार मैं ही हूं. आप दोनों मुझे माफ करो. कुछ गुनाह तो मैंने अनजाने में किये हैं और कुछ जरूर जानबूझ कर. मैं कबूल करता हूं कि ये गुनाह मैंने पूरे होशोहवास में किया है.”

“बाकी सब छोड़ो. होश में किया या बेहोश होकर, मुझे कोई मतलब नहीं. सिर्फ ये बताओ कि सपने दिखाने के बाद तुमने मेरी शादी अपने भाई से क्यों करा दी? इसलिए कि मैं हर पल तड़पती रहूं. लेकिन क्यों… क्यों?”

न तो गुना के सवाल खत्म हो रहे थे, न आंसू रुकने का नाम ले रहे थे. गुना अपना सिर पकड़ कर बैठ जाती है.

उदेश समझाने की कोशिश करता है, “गुना, मेरी बात सुनो. ये मेरे बड़े भैया हैं. भाई ने एक बार भी नहीं पूछा कि मैंने उनके लिए कौन सी लड़की देखी है. मैंने जो जो कहा वो चुपचाप करते गये. शादी के लिए भी मेरी जिद के कारण ही तैयार हो गये.

“तो तुम…” गुना आगे बोलती कि उदेश बीच में ही बात काट देता है.

“मैं डबल सजा के लिए तैयार हूं. तुम दोनों जो कहोगे मुझे मंजूर होगा. मगर, पहले मेरी बात ध्यान से सुन लो. ”
गुना कहती है, “अब भी तुम्हारे पास कहने के ले कुछ बचा हुआ है.”

“एक बात झूठ तो कतई नही है. आप दोनों ही मुझे प्यार करते हो. फर्ज करो मुझे कुछ हो जाता तो आप दोनों का ख्याल आखिर कौन रखता…”
गुना को उदेश की बात किसी नये बहाने जैसा लगती है. तनुश कुछ कहने सुनने की हालत में नहीं लग रहा है. एक साथ उसके दिमाग में कई बातें घुम जाती हैं. गुना के आंसू रुक चुके हैं और उदेश की बातें सुन कर वो मुस्कुराती है. गुना की मुस्कुराहट में तंज का भाव ही ज्यादा लगता है.

“मुझे पता है आप लोग मुझे जी भर कोसोगे… मुझसे नफरत भी करोगे,” फिर थोड़ा उदास होते हुए उदेश कहता है, “लेकिन एक दूसरे का ख्याल तो रखोगे.”

गुना पूछती है, “अच्छा तो तुम अपना घर कहीं और बसाने जा रहे हो,” दोनों हाथों से ताली ठोकते हुए, “बढ़िया… बहुत बढ़िया. सच में ग्रेट हो तुम.”

उदेश समझाने की कोशिश करता है, “न तुम जानती हो – और न भाई. मैं किसी और दुनिया में पहुंच गया हूं. सोचा था आजादी की हवा में सांस लेने को मिलेगा, लेकिन…”

तनुश घबराहट के साथ उदेश के पास पहुंच कर, “मतलब?”

तनुश कभी उदेश का माथा छूता है कभी गला और कभी हाथ. वो जानना चाहता है कहीं उदेश को कोई बड़ी बीमारी तो नहीं हो गयी?

“क्या हुआ तुझे. बोल ना उदेश क्या हुआ…” तनुश घबराये हुए पूछता है.

गुना समझ जाती है कि मामला सीरियस है. वो दोनों के पास पहुंच जाती है और एक साथ दोनों को दिलासा दिलाने की कोशिश करती है.

“काश, जो भाई समझ रहे हैं वैसा होता,” उदेश मन ही मन सोचता है. बहुत इमोशनल हो जाता है, लेकिन खुद को संभालते हुए कहता है, “नहीं भाई, मुझे कोई बीमारी नहीं हुई है. मैंने बहुत हिम्मत जुटाई है ये बात आप दोनों से कहने के लिए,” हाथ जोड़ते हुए, “आप दोनों एक बार मेरी पूरी बात सुन लीजिये.”

तनुश और गुना अंदर से कांप उठते हैं. फिर भी भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश करते हैं.

“अनजाने में ही मैंने बड़ा गुनाह कर बैठा है. जहां से निकलने का एक ही रास्ता है – मौत. चाहे उम्र पूरी होने पर चाहे किसी और बहाने. मेरे लिए कोई यू टर्न नहीं बचा.”

जब तनुश और गुना को बात ठीक से समझ नहीं आती, तो उदेश विस्तार से बताता है –

“मैं कुछ गलत लोगों की संगत में पड़ कर अनजाने में देशद्रोही बन चुका हूं. जब तक इस बात का एहसास हो पाता बहुत देर हो चुकी थी. अब तो कुछ भी नहीं होने वाला. चला था दुनिया बदलने. मुझे क्या पता मेरी ही दुनिया बदल जाएगी.

गुना यही वो वजह है कि मैंने अपनी जगह भैया से तुम्हारी शादी करायी. मुझे मालूम है तुम दोनों मुझ पर बहुत गुस्सा होगे, मगर, एक दूसरे का ख्याल भी तो रखोगे – मकसद तो मेरा यही था.

मैं जानता हूं मेरे बगैर आप दोनों के लिए जिंदगी कितनी मुश्किल होगी. अब मैं कम से कम एक मामले में तो सुकून महसूस कर सकूंगा. मेरे पास और कोई रास्ता नहीं बचा था. मैंने खुद अपने सारे रास्ते अपने लिए बंद कर लिये. हो सके तो आप लोग मुझे माफ कर देना. इतना कहते कहते उदेश रोने लगता है.”

“ओह…” इतना बोलते ही तनुश बेहोश हो जाता है. उदेश उसे संभालने की कोशिश करता है लेकिन तब तक तनुश धड़ाम से गिर जाता है. होश आते ही तनुश, उदेश को पीटना शुरू कर देता है. “मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं किसी गद्दार को पाल-पोस रहा हूं,” उदेश पर लात-घूंसे बरसाते हुए तनुश बड़बड़ाता है. गुना तनुश को रोकने की कोशिश करती है, लेकिन वो सुनता नहीं. जब लगता है कि वो उदेश को मार डालेगा तो डपटते हुए तनुश को जोर से धक्का देकर गुना अलग कर देती है.

तनुश गुस्से से आग बबूला है जबकि उदेश अफसोस के बोझ तले दबा हुआ. कहता है, “भाई मैं सभी का गुनहगार हूं. मैं तो जिंदा बस इसलिए हूं क्योंकि मौत की तारीख मुकर्रर नहीं हो पायी है.”

फिर गुना बोलती है, “ऐसा नहीं है. ऐसा बिलकुल नहीं है. तुम्हें लगता है कि गलती हुई है तो इतना काफी है.

“मेरा यकीन करो गुना,” उदेश रोते रोते कहता है, “मैं भी देश से बाकियों की तरह ही प्यार करता हूं. मगर अब मुझे दोबारा कोई मौका नहीं मिलने वाला. मेरी जिंदगी के यू टर्न खत्म हो चुके हैं.”

गुना ढाढ़स बंथाती है, “गलती सुधारने के लिए मुहूर्त नहीं देखना होता. ठीक वैसे ही जैसे घर लौटने के लिए कभी लेट नहीं होता. Just get a u-turn right now.”

तनुश दहाड़ें मार कर रोने लगता है. अब दोनों को संभालने की जिम्मेदारी गुना पर आ जाती है. थोड़ी देर में नॉर्मल होने पर तीनों लौटने का फैसला करते हैं. गुना कहती है – “सोचते हैं, आगे क्या करना है?”

तनुश फैसला करता है कि अब उसे उदेश से कोई संबंध नहीं रखना. कहता है, “देश से गद्दारी करने वाला मेरा भाई नहीं हो सकता. आगे से तुम्हे घर आने की जरूरत नहीं है. और हां, खबरदार जो मुझे अब से भाई बोलने की कोशिश की तो…”

“मैं तो उस दुनिया का मुसाफिर बन चुका हूं जिसका कभी कोई एक ठिकाना नहीं होता और एक ठिकाने को भी मालूम नहीं होता कि अगला पड़ाव क्या होगा. वो पड़ाव भी मौत की मंजिल तो नहीं होगी, ये भी नहीं पता,” उदेश सारी बातें फिल्मी डायलॉग की तरह एक ही सांस में बोल जाता है.

अगले दिन तीनों लंच पर मिलते हैं. गुना से उदेश कहता है कि वो उसे भूल जाये और भाई को भी ये बात समझाने की कोशिश करे.

गुना कहती है – “ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला. रिश्तों के नाम बदल देने से रिश्ते नहीं बदल जाते.”

गुना देर तक दोनों से बातें करती है. उदेश से उसकी एक्टिविटी, उसके साथी और बाकी बातों के बारे में एक एक कर पूछती है. अब तक उदेश को भी नहीं मालूम था कि गुना वास्तव में कौन है. गुना, दरअसल, सिक्योरिटी फोर्स की अंडरकवर अफसर है, जो देश के खिलाफ साजिश कर रहे आतंकी मंसूबों को नेस्तनाबूद करने के लिए सीक्रेट मिशन का हिस्सा होती है. गुना फोर्स की उन गिने चुने अफसरों में से है जो सोलो ऑपरेशन में यकीन रखते हैं. ऐसे अफसरों को न तो कभी एस्कॉर्ट की जरूरत होती है, न ही बैक अप की. वे सारी कवायत खुद तय करते हैं और उन्हें अकेले ही अंजाम देते हैं.

गुना को लगता है कि उसका मिशन भले अधूरा हो, पर ये ऑपरेशन पूरा हो चुका है. वो कोई एक्शन ले उससे पहले ही उदेश खुद ही बता देता है कि वो दुनिया ही नहीं अपनी नजर में भी खुद को देशद्रोही समझने लगा है और इसका उसे बहुत अफसोस है. वो फिर से सामान्य जीवन जीना चाहता है लेकिन उसे रास्ता नजर नहीं आता.

उदेश के सारी बातें बता देने के बाद भी गुना अपनी असलियत नहीं बताती. वो उदेश के जरिये उसके साथियों तक पहुंचती है. जल्द ही देश के खिलाफ रची जा रही बड़ी साजिश का पर्दाफाश करती है. इस दौरान गुना की दोनों भाइयों से मुलाकात नहीं हो पाती. उदेश को भी गुना फोर पर ही खूब इधर उधर घुमाती रहती है. गुना की कोशिश रहती है कि एनकाउंटर में उदेश का भी साथियों जैसा हाल न हो. सुरक्षा बलों की छापेमारी में उदेश के सारे साथी मारे जाते हैं.

गुना को तनुश बहुत ही इमानदार और देशभक्त इंसान लगता है. न सिर्फ अपनी शादी बल्कि शादी जैसे संस्थान को भी गुना झूठ के साये से बचाने का खुद से वादा करती है. गुना तय करती है कि अब तो वो तनुश के साथ ही बाकी जिंदगी गुजारेगी, लेकिन उदेश को भी सही रास्ते पर लाकर ही दम लेगी.

बेहद सफल ऑपरेशन के लिए गुना को एक समारोह में सम्मानित किया जाता है. ऑपरेशन पर अपनी रिपोर्ट में गुना, उदेश का विशेष रूप से जिक्र करती है. साथ ही, उदेश के रिहैबिलिटेशन के लिए भी स्ट्रॉन्ग रेकमेंडशन नोट लिखती है.

मिशन खत्म होने के बाद मीडिया के सवालों से तो दो-चार होना ही था, लेकिन गुना पूरी तैयारी के साथ आती है. जब गुना से पूछा जाता है कि बेगुनाहों की जान लेते वक्त जरा भी दया भाव उसके मन में नहीं आता, गुना का जवाब होता है – “हम कभी किसी की जान नहीं लेना चाहते. हम कौन होते हैं किसी की जान का फैसला करने वाले. उसके लिए कोर्ट है, ऊपरवाला है. हमारी पूरी कोशिश होती है हम इमानदारी से अपना फर्ज निभायें. कभी कभी हमसे चूक भी हो जाती है. हम भी इंसान हैं, लेकिन ये भी सच है कि हम हर गुनहगार को पूरा मौका देते हैं.”

अगला सवाल होता है – “ऐसी कोई मिसाल शेयर करना चाहेंगी?”

गुना मीडिया को उदेश की पूरी कहानी सुनाती है. तभी एक मैसेंजर किनारे बैठे अफसर को एक लिफाफा थमाता है. उस पर गुना का नाम लिखा होता है, इसलिए वो पास कर देता है. गुना समझ जाती है कि लिफाफे के भीतर का मजमून भी उसी कहानी का हिस्सा होगा जो वो सुना रही है. वो हमेशा की तरह इस बार भी बिलकुल सही होती है – लिफाफे में उदेश के पुनर्वास को लेकर सरकारी आदेश होता है.

गुना जब पढ़ कर सुनाती है तो पूरा कांफ्रेंस हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है.

सबको शुक्रिया कह गुना बाहर की ओर बढ़ती है. गेट पर पहुंचती है तो देखती है तनुश पहले से ही उसका इंतजार कर रहा होता है. गुना को देखते ही वो उसका पैर पकड़ने के लिए झुकता है. गुना तपाक से उदेश को पकड़ लेती है और दोनों एक दूसरे के गले लग जाते हैं.
तनुश को गुना मसीहे जैसी लगती है – क्योंकि उसके कलेजे के टुकड़े उदेश को नयी जिंदगी बख्शी है.

“तुम साक्षात देवी हो गुना,” तनुश कहता है.

“नहीं. मैं एक देशभक्त की पत्नी हूं,” गुना का जवाब होता है.

तब तक मीडिया के कैमरे भी दोनों को घेर चुके होते हैं. कैमरों के चमकते फ्लैशलाइट के बीच ही दोनों हाथों में हाथ डाले जिंदगी के नये सफर पर निकल जाते हैं.

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