…क्योंकि वो भी कभी बेटी थी!

…क्योंकि वो भी कभी बेटी थी!

“ममा, मेरे को एक ट्रिप पे जाना है, आपकी परमिशन तो है?”

“हां-हां ठीक है, लेकिन… ”

“…लेकिन क्या ममा कोई प्रॉब्लम है? तो नहीं जाते हैं!”

“अरे वो बड़ी वाली दीदी तुमसे मिलने आ रही हैं.”

“ठीक है ममा नहीं जाती हूं. इसमें क्या है! बाद में चले जाएंगे.”

“थैंक्यू बेटा!”

“क्या ममा! आप भी! आखिर मौसी मिलने तो मुझसे ही आ रही हैं ना.”

[शाम को. डोर बेल बजती है. गेस्ट अंदर आते हैं. महिला कुछ घबराई हुई सी उसके रूम में जाती हैं.]

“वो तुम्हें जाना था न. तुम निकल जाओ. नाहक ही मैंने तुम्हें रोक लिया. पता नहीं मेरे दिमाग को क्या हो गया था.”

“लेकिन ममा…”

“लेकिन वेकिन छोड़… दीदी की चिंता मत कर. मैं उनसे बात कर लूंगी. तू बस जा… चली जा अभी बस…”

“पर हुआ क्या ममा? सुबह तो आप जाने नहीं दिये. अब कह रहे हो कि दीदी की चिंता छोड़ो. बात क्या है.”

[तभी महिला उसके जरूरी सामान जल्दी जल्दी सूटकेस में पैक कर देती है – और कहती है तुम अभी के अभी बैक डोर से निकल जाओ. लड़की कुछ समझ पाती उससे पहले मौका दिये बगैर उसका हाथ पकड़ कर बाहर करने की कोशिश करती है.]

“एक मिनट ममा. एक फोन तो कर लेने दो.

“Hi! कहां हो? अच्छा सुनो, मालूम नहीं, ममा को अचानक क्या हो गया है? तुम बस जल्दी से घर आ जाओ…”

“हुआ क्या… ये तो बताओ… अभी मैं…”

“वो सब छोड़ो. बाद में देख लेंगे. पहले तुम घर पहुंचो… और हां, पापा को भी पिक कर लेना.”

महिला कुछ सुनने को तैयार नहीं थी. एक कोने से दूसरे कोने तक बस इधर से उधर दौड़ रही थी.

“ममा प्लीज कूल हो जाओ. ठीक है मैं चली जाऊंगी, लेकिन आपको ऐसे परेशान छोड़ कर कैसे जा सकती हूं भला?”

“कोई नहीं बेटा. मेरी फिकर न कर. तू बस चली जा. मैं सब मैनेज कर लूंगी.”

“मैनेज! मैनेज क्या करना… ममा!”

तभी नौकर की आवाज आती है – “मेम साब, चाय दे दी है. सर जी छोटी मेम साब को बुला रहे हैं.”

“कौन आया है ममा? डोरबेल तो बजी थी, पर आपको घबराये देख मैं तो पूछना ही भूल गयी.”

“वो वो… वो वो वो…”

“वो क्या ममा. बात तो बताओ. ऐसा कौन है जरा देखूं तो. किसकी मजाल है जो आपको…”

“वो कुछ नहीं बेटा. वो जेलर…”

“जेलर…”

“मैं तुझे उस जेल में एक पल के लिए नहीं जाने दूंगी.”

फिर लड़की जोर का ठहाका लगाती है. और महिला का हाथ पकड़ कर बैठाती है, “अरे ममा! डैडी आये हैं इसलिए आप परेशान हो गये हो…”

“अरे ममा, वो मेरे डैडी हैं. मम्मी के जाने के बाद उनकी पूरी कोशिश रही कि मुझे कोई दिक्कत ना हो. मैं बड़ी होकर कुछ बन जाऊं. बस, इसीलिए वो थोड़े स्ट्रिक्ट हो गये… अब वो तो उनके ख्याल रखने का तरीका है.”

“तरीका क्या होता है… ये कोई तरीका है.”

“ममा उन्हीं की वजह से तो आप मुझे अपने घर लायीं. अगर वो ऐसा न करते तो आप मुझे लातीं क्या?”

“मुझे तो अब भी सब कुछ वैसे है फ्रेश लगता है. उस पार्टी में आप कैसे ग्लैमरस लग रहे थे. मैं आपको देखी तो बस देखती ही रह गयी. डैडी शुरू हो गये क्योंकि वो मेरे लिए प्लेट लेकर खड़े थे और मैं उनकी तरफ देख भी नहीं रही थी.”

“बिलकुल. मुझे भी याद है कि कैसे जेलर ने तेरे हाथ से प्लेट ले ली थी. सिर्फ इसलिए कि सलाद खाते वक्त मुंह से चबाने की आवाज आ रही थी. फिर गोलगप्पे की चटनी तेरे ड्रेस पर गिर पड़ी तो कसाई ने कितनी बेरहमी से डांटा था.”

वो सिर्फ हंसे जा रही थी. महिला की कोशिश बस यही थी कि कैसे वो उसके डैडी के पास न जाने दे.

“मैं वो सीन कैसे भूल सकती हूं. तब की बात और थी. अब वो जल्लाद तुम्हें कैसे परेशान कर सकता है, भला?”

“हा हा हा… ममा आप भी तो नहीं बदले… अभी वैसे ही हो… ”

“फिर दोनों एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगते हैं…”

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