थैंक यू जानू, मेरे मन से गिल्ट दूर कर दिया!

थैंक यू जानू, मेरे मन से गिल्ट दूर कर दिया!

पति बाथरूम में होते हैं. तभी कॉल आती है. शॉवर की आवाज में रिंग सुनाई नहीं दे रहा. पत्नी के तेज आवाज में बताने पर भी.

पत्नी – अजी सुनते हो! तुम्हारा फोन घनघना रहा है.

पति – क्या भनभना रहा है?

पति – मेरा माथा झनझना रहा है. सुनते हैं नहीं और…

पत्नी घर का काम भी कर रही हैं और झुंझलाहट में भुनभुनाती चली जा रही हैं. पति जान जाते हैं कि शॉवर के चलते उल्टा पुल्टा सुनाई दे रहा है.
दिमाग पर जोर डाल कर समझने की कोशिश करते हैं और हमेशा की तरह जल्दी ही सफलता भी मिल जाती है.

पति – अच्छा फोन घनघना रहा है.

पत्नी – हां. भला अक्कल तो आई.

पति – मां का फोन होगा. उठा लो. बोल दो बस अभी आते हैं.

पत्नी फोन के पास जाती हैं. उठाते उठाते कॉल खत्म हो चुकी होती है.

पत्नी – हां, मां ही हैं. अब मैं क्या बोलूं. तुम्हीं आकर कॉल बैक कर लेना.

पति शॉवर बंद कर लिये होते हैं. पत्नी की बातें अब साफ साफ सुनायी दे रही हैं.

पति – ठीक है. तुम वो सब जरा दे देना.

ऐसा अक्सर होता है कि पति जल्दी जल्दी बाथरूम में घुस जाते हैं. कभी तौलिया तो कभी अंडरवियर और बनियान भूल जाते हैं. जब जरूरत पड़ती है तब ध्यान जाता है.

पत्नी – ठीक है. देती हूं. देना तो है ही. ये तो रोज का है.

पत्नी पति का फोन फिर से साइड टेबल पर रख देती हैं. फोन हल्का सा वाइब्रेट करता है. पॉप अप से मालूम होता है कि मैसेज है. वैसे तो फोन को लेकर दोनों में कुछ वैसी ही अंडरस्टैंडिंग है जैसी नेताओं या अपराधियों में होती है – दोनों ही एक दूसरे का न तो कॉल अटेंड करते हैं और न ही कभी

मैसेज पढ़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन पॉप अप में जो आधा अधूरा लिखा है उसे देख पत्नी खुद को रोक भी नहीं पाती.

पति – क्या हुआ? मां से बात हो गयी.

पत्नी – नहीं जी. मेरे पहुंचने तक फोन बंद हो गया था.

पति – ओके. नो प्रॉब्लम

पत्नी मैसेज ओपन करती हैं. बुक माय शो का मैसेज है. मूवी टिकट का रिमाइंडर है. पत्नी बड़ी खुश होती हैं.

पत्नी – अरे वाह! ये तो मूवी का प्लान किये हुए है. बताया भी नहीं. सरप्राइज है, ग्रेट!

पत्नी फोन रख कर काम में लग जाती हैं. पति बाहर आते हैं और रोजाना की तरह हड़बड़ी में तैयार होकर ऑफिस निकल जाते हैं. पत्नी दिन भर सरप्राइज का इंतजार करती है.

पत्नी, मन ही मन सोचती हैं – अभी तक फोन नहीं आया. अब तो पहुंचते पहुंचते शो भी शुरू हो जाएगा.

पत्नी बार बार फोन देखती हैं. कभी फोन तो कभी खिड़की से बाहर की ओर देखती हैं. थोड़ी बेचैनी भी है. पति कि चिंता भी है, लेकिन खुद कॉल इसलिए नहीं करतीं कि सरप्राइज का मजा किरकिरा न हो जाये.

तभी पति का मैसेज आता है – ‘वेट मत करना. ऑफिस की मीटिंग है, डिनर के बाद लौटूंगा. तुम सो जाना.’

पत्नी का गुस्सा फूट पड़ता है – ‘अच्छा. मालूम है कौन सी मीटिंग है. सुबह मां का फोन आया था. आओ अब नानी याद दिलाती हूं.’

पत्नी गुस्से से इधर उधर चक्कर काटती हैं. जिसकी भी शामत आयी होती है वो सामान हाथ लगते ही जोर लगाकर फेंक देती हैं. गुस्से में नींद तो आने से रही. देर रात पति महोदय भी आ जाते हैं. आते ही पहला सवाल दाग देती हैं.

पत्नी – और… मीटिंग कैसी रही?

पति – अरे हां… (कुछ अटकने जैसा. शायद भूल चुके होते हैं कि मीटिंग का ही बहाना बनाया था या कुछ और…) हर बार वही थकाऊ मीटिंग होती है. जब कुछ होना नहीं फिर मीटिंग होती क्यों है. समझ नहीं आता!

पत्नी – ग्रेट! (थोड़ा रुक कर, लेकिन एक झटके में) और फिल्म कैसी थी?

पति – मस्त. मजा आ गया…

बोलने के बाद पति को समझ आता है कि क्या बोल गये? फिर बात बदलने की कोशिश करते हैं.

पति – फिल्म! कौन सी फिल्म? कैसी फिल्म?

पति हाथ पकड़ कर हग करने की कोशिश करते हैं. लगता है एक झटके में सारा प्यार उड़ेल देंगे. जोर से बाहों में भर लेते हैं. पत्नी भी कोई विरोध नहीं जताती हैं. झूठा ही सही, प्यार के दो पल तो हमेशा ही खुशी से भर देते हैं. फिर भी बातों में गुस्सा कम नहीं होता.

पत्नी – कैसी फिल्म? बताऊं कौन सी फिल्म? कैसी फिल्म?

पति सकपकाते हुए ही सही आश्चर्य का भाव प्रकट करने की कोशिश में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ते.

पत्नी – सुबह ही मैंने मैसेज देख लिया था. देखा क्या था… मैं क्यों देखती भला. मैसेज खुद ही उछल रहा था. बिलकुल तुम्हारे ताजा ताजा प्यार की तरह उमड़ते घुमड़ते.

पति – अरे वो. मैंने प्लान जरूर किया था, लेकिन वो ऑफिस…
पत्नी – अब रहने भी दो. मेरे लिए तो फुरसत मिलती नहीं. हम पत्नियों की सौतन तो ऑफिस ही है. मालूम नहीं किस किस का निक नेम ऑफिस रखा जाता होगा.

पति को जब लगता है कि स्थिति तनावपूर्ण तो है लेकिन नियंत्रण में आ चुकी तो प्यार से समझाने की कोशिश करते हैं.

पति – वो देखो ना… वो क्या है ना कि… तुम तो जानती ही हो… आज कल की फिल्में फेमिली के साथ देखने लायक तो होती नहीं…

पति अपनी बात पूरी करते कि बीच में ही पत्नी ठहाके लगाकर हंसती हैं. पति समझ नहीं पाते अब क्या हुआ?

पत्नी – थैंक यू जानू!

पति – थैंक्यू? किस बात के लिए?

पति मन ही मन सोचते हैं कि उनका आइडिया काम कर गया. आगे के लिए भी सोच लेते हैं कि यही नुस्खा आजमाया जा सकता है.

पत्नी – थैंक्स जानू… आपने तो मेरे मन का बोझ ही खत्म दिया. बड़ा बोझ था दिल पर. मन में एक गिल्ट थी. उस गिल्ट तुमने हमेशा के लिए खत्म कर दिया. थैंक्स अगेन एंड अगेन. थैक्स गॉड जी… अगले जनम भी मुझे यही पति दीजो.

पत्नी ये सब थोड़ा इतराते इठलाते कहे जा रही थीं. पति को हवा ही नहीं लग रही कि आखिर चल क्या रहा है?

पति – गिल्ट! कैसा गिल्ट? किस बात का गिल्ट?

पत्नी – आय डू एग्री विद यू जानू. ऑब्स्ल्युटली.

पति – तुम ठीक तो हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?

पति के सवालों से बेपरवाह पत्नी अपनी धुन में बोले जा रही थी. जो जी में उस वक्त आता मुंह से अपनेआप निकल जा रहा था.

पत्नी – कई फिल्में इधर आईं हैं. सभी नयी फिल्मों को लेकर मेरी भी वही राय बनी जो आप कह रहे हैं. इसीलिए मैं भी…

पति – इसीलिए मैं भी क्या… तुम भी!

पत्नी – बिलकुल सही समझे.

पति – मतलब…

पत्नी – मतलब वही जो आप समझ रहे हैं…

पति – यू मीन…

पत्नी – इग्जैक्टली.

पति को तो अब चुप होना ही था. फिर पत्नी सुनाने लगीं कि शर्मा जी की छुट्टियां चल रही थीं. मिसेज शर्मा भी अपने ऑफिस के काम से तीन महीने के लिए लंदन चली गयी थीं. एक दिन बातचीत में पता चला कि शर्मा जी भी फर्स्ट डे फर्स्ट शो वाले हैं.

पत्नी – दोपहर में टीवी सीरियल भी रिपीट दिखाते हैं… फिर हम दोनों…

पति – मतलब तुम और शर्मा जी!

पत्नी – हां, आपके ऑफिस से आने से पहले हम लोग फिल्म देखकर लौट आते थे. मैं बताना चाहती थी, लेकिन हमेशा मन में एक गिल्ट…

पति – तो ये आपकी सती सावित्री पतिव्रता कथा पूरी हो गयी, या अभी कुछ और भी बाकी है.

पत्नी – पूरा ही समझो. बस थोड़ा सा.

पति – बाकी भी कृपा करके बता ही दें देवी जी.

पत्नी – शर्मा जी के साथ आते जाते देखते तो सारे लोग होंगे लेकिन कभी कोई कुछ बोला नहीं. एक दिन आपके ऑफिस वाले मेहता जी मिले थे. मल्टीप्लेक्स में ही. वो भी किसी के साथ फिल्म देखने आये थे. मुझे भी ऑफर किया था. एक तो फ्री में मूवी का ऑफर और दूसरे दिखाने वाला आपके ऑफिस में साथ काम करने वाला. कहीं मेरी वजह से वो बुरा मान जायें और आपसे रिश्ता खराब हो. ये सब सोचकर मैं मना नहीं कर पायी…
पत्नी अभी न जाने कितने गिल्ट दूर करने वाली थीं. पति से बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था. वो तेजी से बाथरूम में गये और दरवाजा बंद कर शॉवर चालू कर तेज कर दिया.

जब दोनों बात कर रहे थे किसी का बार बार फोन आ रहा था. पति फोन काटकर कॉल यू लेटर मैसेज भेज दे रहे थे. बाथरूम जाने पर फोन लगातार रिंग होने लगा. उसे काटे कौन? न पति कुछ करने को कह रहे थे, न पत्नी अपने मन से कुछ करने वाली थीं. कुछ देर बाद पति ने खुद ही शॉवर स्लो कर रिंगटोन पहचानने की कोशिश की और समझ गये – फोन उसी सहयोगी का था जिसके साथ फिल्म देखने गये हुए थे.

पत्नी – हेलो.

अचानक पति को लगा पत्नी ने फोन उठा लिया. तभी समझ में आ गया कि अक्सर वे दोनों भी एक दूसरे को हेलो कह कर बुलाते हैं. पहले तो सोचा दोनों की बात करा दूं आपस में सलट लेंगी. पति को अपनी पत्नी और सहयोगी दोनों की समझ और सोशल व्यवहारकुशलता का पता था. मालूम था दोनों लड़ने की बजाय बड़े अच्छे से बातें करेंगी. फिर भी कुछ नहीं कहा. चार-पांच बार के बाद फोन आना बंद हो गया.

पति ने शॉवर बंद कर पूछा – बोलो बाबू.

जिस तरह पत्नी जानू बुलाती थीं, उसी तरह पति उन्हें बाबू कहा करते थे.

पत्नी – कल छुट्टी ले सकते हैं क्या?

पति को तो बस जैसे ऐसे ही मौके की तलाश थी. वो तो बस यही चाह रहे थे कि कैसे गृहस्थी को पटरी पर लाया जाये. पति भले ही दफ्तर की दोस्तों के साथ गुलछर्रे उड़ाये पत्नी किसी को नजर भर देख ले तो भी बर्दाश्त नहीं होता. ये तो पड़ोसी और दफ्तर के सहयोगी के साथ फिल्म देखने जाने का मामला था.

पति – हां-हां, बिलकुल.

पत्नी – ठीक है फिर सुबह कुछ प्लान करते हैं.

अब पति को ज्यादा शॉवर की जरूरत नहीं रह गयी थी. जल्दी ही बाहर निकल आये. हाव भाव देख कर बगैर पूछे पत्नी कॉफी बनाने चली गयीं. इंडक्शन ऑन होने की आवाज आयी तो कंफर्म भी हो गया. कपड़े पहनते पहनते पत्नी कॉफी लेकर हाजिर थीं.

पति – मैं सोच रहा था परसों भी छुट्टी ले लेता हूं. दो दिन वीकेंड भी है. कहीं बाहर चलते हैं.

पत्नी – अभी?

पति – नहींईईई जी. अर्ली मॉर्निंग की कोई फ्लाइट लेंगे. वैसे डेस्टिनेशन?

पत्नी – जहन्नुम भी चलेगा, लेकिन मैं नौ बजे से पहले तो उठने से रही. 12 बजे से पहले की फ्लाइट नहीं चलेगी.

पति – ठीक है. सीजन तो गोवा का ही है. देखते हैं क्या ऑप्शन हैं?

अगले दिन दोपहर बाद दोनों गोवा में चेक इन कर चुके होते हैं. दोनों खूब घूमते हैं और दिन में दो-दो शो भी देख लेते हैं. पति को भी लगता है कि वे शायद पहले कपल होंगे जो गोवा जाकर भी मूवी देख रहे हैं.

तीन दिन तक पत्नी का खूब खातिर भाव होता है. लौटते वक्त पति महोदय मैडम की राय जानना चाहते हैं?

पति – अब तो कुछ दिन शर्मा जी और मेहता जी की कंपनी की जरूरत नहीं पड़नी चाहिये?

पत्नी – और नहीं तो क्या… जब देर तक ऑफिस की मीटिंग नहीं चलेगी और डिनर भी आपका घर पर ही होगा तो जरूरत ही क्या है?

पति – एक बात पूछें?

पत्नी – एक और दो क्या सौ, हजार, लाख… जितने भी पूछ लीजिए. आपको ये पूछने की जरूरत क्या है?

पति – वैसे तुम उन दोनों के साथ कितनी बार गयी होगी?

पत्नी – आपको लगता है? मैं भी ऐसा कर…

पति – लगता तो नहीं है. पर तुमने कहा तो मानना पड़ा.

पत्नी – तो मान लिये या…

पति – मन नहीं मानता…

पत्नी – जब मन नहीं मानता तो दिल की सुनिये. जो आपको लगता है, सच वही है.

पति – तो तुम सिर्फ मुझे सबक सिखाने के लिए कहानी गढ़ रही थी?

पत्नी – इस बार सिर्फ कहानी गढ़ी थी, लेकिन आगे के लिए वॉर्निंग है. ध्यान रहे और याद रहे.

पति को बहुत अफसोस होता है. मन करता है कि पकड़ कर जोर से बाहों में भर लें – लेकिन एयरपोर्ट और फ्लाइट में दोनों के लिए संभव नहीं. अब दोनों को बस इसी बात का बेसब्री से इंतजार है कि कब घर लौट जायें.

[ END ]


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सत्या एस. दूबे | Satya S. Dubey
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[ABOUT THE AUTHOR: Satya S. Dubey loves storytelling, apart from cooking, shopping and travelling incessantly. She spares most of her time in conceptualizing different form of fiction including children and inspirational stories. A short film ‘SOUR’, based on her story was released recently. She lives in NCR with her spouse and a pet among other people who let her feel very special.]

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